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Rigveda / 8 / 10 / 4

ययो॒रधि॒ प्र य॒ज्ञा अ॑सू॒रे सन्ति॑ सू॒रय॑: । ता य॒ज्ञस्या॑ध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसा स्व॒धाभि॒र्या पिब॑तः सो॒म्यं मधु॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : प्रगाथः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : भुरिक्बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय :

पदपाठ : ययोः॑ । अधि॑ । प्र । य॒ज्ञाः । अ॒सू॒रे । सन्ति॑ । सू॒रयः॑ । ता । य॒ज्ञस्य॑ । अ॒ध्व॒रस्य॑ । प्रऽचे॑तसा । स्व॒धाभिः॑ । या । पिब॑तः । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥ ८.१०.४

पदार्थ : (ययोः) जिनके (यज्ञाः, प्र, अधि) यज्ञ अधिक प्रवृत्त होते हैं (असूरे) विद्यारहित देश में (सूरयः, सन्ति) जिनके विद्वान् बसते हैं (अध्वरस्य, यज्ञस्य, प्रचेतसा) हिंसारहित यज्ञों के जाननेवाले (ता) वे दोनों (स्वधाभिः) स्तुति द्वारा आवें (या) जो (सोम्यम्, मधु, पिबतः) सोम के मधुर रस को पीते हैं ॥४॥

भावार्थ : हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! विद्यारहित प्रदेशों में विद्याप्रचार का सुप्रबन्ध उन देशों में वास करनेवाले विद्वानों द्वारा करावें और हिंसारहित यज्ञों में सहायक होकर उनको पूर्ण करें ॥४ ॥