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Rigveda / 8 / 12 / 7

व॒व॒क्षुर॑स्य के॒तवो॑ उ॒त वज्रो॒ गभ॑स्त्योः । यत्सूर्यो॒ न रोद॑सी॒ अव॑र्धयत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराडार्ष्युष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय :

पदपाठ : व॒व॒क्षुः । अ॒स्य॒ । के॒तवः॑ । उ॒त । वज्रः॑ । गभ॑स्त्योः । यत् । सूर्यः॑ । न । रोद॑सी॒ इति॑ । अव॑र्धयत् ॥ ८.१२.७

पदार्थ : (अस्य) इस परमात्मा के (केतवः) ज्ञान (ववक्षुः) लोक को धारण कर रहे हैं (उत) और (गभस्त्योः) पालन तथा संहाररूप दोनों बाहु में (वज्रः) दण्डरूपशस्त्र धारण कर रहा है (यत्) क्योंकि उन्हीं ज्ञानों से (सूर्यः, न) सूर्य के सदृश (रोदसी) द्युलोक और पृथिवीलोक को (अवर्धयत्) अभिव्यक्त करता है ॥७॥

भावार्थ : इस मन्त्र में ज्ञान को संसार का पालक इसलिये कहा है कि बिना ज्ञान के जड़ प्रकृति किसी कार्य्य की प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति में समर्थ नहीं हो सकती । जिस प्रकार सूर्य्य अपने प्रकाश से जगत् के सकल घटापटादि पदार्थों को व्यक्त करता है, इसी प्रकार जीव भी प्रकृति के आश्रित होकर ज्ञानशक्ति ही से सम्पूर्ण पदार्थों को विषय करता है और इस परमात्मा की पालन तथा संहाररूप दोनों शक्ति ही गभन्ति=बाहुस्थानीय मानी है, जिनसे सत्पुरुषों का पालन तथा असत्पुरुषों का संहाररूप दण्ड से संसार की स्थिति होती है ॥७ ॥