Rigveda / 8 / 12 / 8
यदि॑ प्रवृद्ध सत्पते स॒हस्रं॑ महि॒षाँ अघ॑: । आदित्त॑ इन्द्रि॒यं महि॒ प्र वा॑वृधे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 12 | Mantra No : 8
In English:
Seer : parvataH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yadi pravRRiddha satpate sahasra.m mahiShaa.N aghaH . aaditta indriya.m mahi pra vaavRRidhe .
Component Words : yadi . pra.avRRiddha . sat.apate . sahasram . mahiShaan . aghaH . aat . it . te . indriyam . mahi . pra . vavRRidhe . 8.12.8
In Hindi:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : यदि॑ । प्र॒ऽवृ॒द्ध॒ । स॒त्ऽप॒ते॒ । स॒हस्र॑म् । म॒हि॒षान् । अघः॑ । आत् । इत् । ते॒ । इ॒न्द्रि॒यम् । महि॑ । प्र । व॒वृ॒धे॒ ॥ ८.१२.८
पदार्थ : (प्रवृद्ध) हे सर्वोत्तम (सत्पते) सज्जनपालक ! (यदि) जो कि (सहस्रम्) असंख्यात (महिषान्) बड़े-२ असुरों को आप (अघः) नष्ट करते हैं (आत्, इत्) इसी से (इन्द्रियम्) आपका ऐश्वर्य (महि) अत्यन्त (प्रवावृधे) बढ़ा हुआ है ॥८॥
भावार्थ : हे दुष्टनाशक तथा सज्जनप्रतिपालक परमात्मन् ! आप वेदविहित कर्मों के पालक, सज्जनों के सदा सहायक रहते हैं, जो अपने कर्मानुष्ठान में कभी विचल नहीं होते और आप दुष्ट असुरों के सदा नाशक हैं । यह आपका नियम अटल है, इसी से आप महान् हैं कि आप सदा न्यायदृष्टि से ही संसार का पालन, पोषण तथा रक्षण करते हैं ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : पर्वतः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : यदि॑ । प्र॒ऽवृ॒द्ध॒ । स॒त्ऽप॒ते॒ । स॒हस्र॑म् । म॒हि॒षान् । अघः॑ । आत् । इत् । ते॒ । इ॒न्द्रि॒यम् । महि॑ । प्र । व॒वृ॒धे॒ ॥ ८.१२.८
भावार्थ :