Rigveda / 8 / 13 / 13
हवे॑ त्वा॒ सूर॒ उदि॑ते॒ हवे॑ म॒ध्यंदि॑ने दि॒वः । जु॒षा॒ण इ॑न्द्र॒ सप्ति॑भिर्न॒ आ ग॑हि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 13
In English:
Seer : naaradaH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : uShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : have tvaa suura udite have madhya.mdine divaH . juShaaNa indra saptibhirna aa gahi .
Component Words : have . tvaa . suure . ut.aite . have . madhyandine . divaH . juShaaNaH . indra . sapti.abhiH . naH . aa . gahi . 8.13.13
In Hindi:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : हवे॑ । त्वा॒ । सूरे॑ । उत्ऽइ॑ते । हवे॑ । म॒ध्यन्दि॑ने । दि॒वः । जु॒षा॒णः । इ॒न्द्र॒ । सप्ति॑ऽभिः । नः॒ । आ । ग॒हि॒ ॥ ८.१३.१३
पदार्थ : (इन्द्र) हे परमात्मन् ! (सूरे, उदिते) अभ्युदय के उदयकाल में (त्वा, हवे) आपका आह्वान करते हैं (दिवः, मध्यन्दिने) दिव्य पदार्थों की स्थिति में (हवे) आह्वान करते हैं (जुषाणः) प्रेमसहित आप (सप्तिभिः) सरणशील शक्तियों द्वारा (नः) हमारे समीप (आगहि) आएँ ॥१३॥
भावार्थ : हे सर्व ऐश्वर्य्यों के स्वामी परमात्मन् ! ऐश्वर्य्यप्राप्ति के प्रारम्भ में तथा ऐश्वर्य्य प्राप्त होने पर, हम लोग आपकी शरण को प्राप्त होते हैं, अर्थात् आप ही हमारे ऐश्वर्य्य की रक्षा करें, जिससे हम यज्ञादि कर्मों में प्रवृत्त होकर सदा आपकी उपासना करते रहें ॥१३ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : हवे॑ । त्वा॒ । सूरे॑ । उत्ऽइ॑ते । हवे॑ । म॒ध्यन्दि॑ने । दि॒वः । जु॒षा॒णः । इ॒न्द्र॒ । सप्ति॑ऽभिः । नः॒ । आ । ग॒हि॒ ॥ ८.१३.१३
भावार्थ :