Rigveda / 8 / 13 / 14
आ तू ग॑हि॒ प्र तु द्र॑व॒ मत्स्वा॑ सु॒तस्य॒ गोम॑तः । तन्तुं॑ तनुष्व पू॒र्व्यं यथा॑ वि॒दे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 13 | Mantra No : 14
In English:
Seer : naaradaH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : nichRRiduShNik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aa tuu gahi pra tu drava matsvaa sutasya gomataH . tantu.m tanuShva puurvya.m yathaa vide .
Component Words : aa . tu . gahi . pra . tu . drava . matsva . sutasya . go.amataH . tantum . tanuShva . puurvyam . yathaa . vide . 8.13.14
In Hindi:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : आ । तु । ग॒हि॒ । प्र । तु । द्र॒व॒ । मत्स्व॑ । सु॒तस्य॑ । गोऽम॑तः । तन्तु॑म् । त॒नु॒ष्व॒ । पू॒र्व्यम् । यथा॑ । वि॒दे ॥ ८.१३.१४
पदार्थ : हे परमात्मन् ! (तु) शीघ्र (आगहि) आइये (तु) शीघ्र ही (प्रद्रव) सुरक्षित करिये (सुतस्य, गोमतः, मत्स्व) संस्कारशुद्ध प्रशस्तवाक् विद्वान् को हर्षित करिये (पूर्व्यम्) अनादि (तन्तुम्) परम्परागत सन्तान को (तनुष्व) बढ़ाइये (यथा, विदे) जिस प्रकार हम लोग आपको जानते रहें ॥१४॥
भावार्थ : हे परमात्मन् ! आप कृपा करके संस्कारी तथा प्रशस्त वाक्=बोलने में चतुर विद्वान् पुरुषों को ऐश्वर्य्यसम्पन्न करें और उन्हें पुत्र-पौत्रादि सन्तान से भी वृद्धि को प्राप्त करें, ताकि वह परम्परागत आपको प्रजाजनों पर प्रकाशित करते रहें ॥१४ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : नारदः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृदुष्णिक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : आ । तु । ग॒हि॒ । प्र । तु । द्र॒व॒ । मत्स्व॑ । सु॒तस्य॑ । गोऽम॑तः । तन्तु॑म् । त॒नु॒ष्व॒ । पू॒र्व्यम् । यथा॑ । वि॒दे ॥ ८.१३.१४
भावार्थ :