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Rigveda / 8 / 16 / 3

तं सु॑ष्टु॒त्या वि॑वासे ज्येष्ठ॒राजं॒ भरे॑ कृ॒त्नुम् । म॒हो वा॒जिनं॑ स॒निभ्य॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 16 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब संग्राम के आरम्भ में क्षात्रबलप्रधान योद्धाओं को परमात्मा की उपासना करना कथन करते हैं।

पदपाठ : तम् । सु॒ऽस्तु॒त्या । वि॒वा॒से॒ । ज्ये॒ष्ठ॒ऽराज॑म् । भरे॑ । कृ॒त्नुम् । म॒हः । वा॒जिन॑म् । स॒निऽभ्यः॑ ॥ ८.१६.३

पदार्थ : (ज्येष्ठराजम्) सबके अधिक=बड़े राजा (महः, कृत्नुम्) महान् कार्यों के करनेवाले (वाजिनम्) प्रशस्त बलवाले (तम्) उस परमात्मा को (भरे) संग्राम में (सनिभ्यः) बलप्रदान के लिये (सुष्टुत्या) सुन्दर स्तुतियों द्वारा (आविवासे) आसेवन करता हूँ ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र का भाव यह है कि संग्राम प्राप्त होने पर बल, बुद्धि तथा शत्रु के पराजयार्थ योद्धा लोग उस सर्वोपरि महाराजा परमात्मा से प्रार्थना करते हैं, जो महान् कार्यों को पूर्ण करनेवाला, महान् बलसम्पन्न और जो संग्राम में विजय का देनेवाला है, अतएव मनुष्यमात्र को उसकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना करते हुए उन्नत होने का प्रयत्न करना चाहिये ॥३ ॥