Rigveda / 8 / 16 / 8
स स्तोम्य॒: स हव्य॑: स॒त्यः सत्वा॑ तुविकू॒र्मिः । एक॑श्चि॒त्सन्न॒भिभू॑तिः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 16 | Mantra No : 8
In English:
Seer : irimbiThiH kaaNvaH | Devta : indra: | Metre : viraaDgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sa stomyaH sa havyaH satyaH satvaa tuvikuurmiH . ekashchitsannabhibhuutiH .
Component Words : saH . stomyaH . saH . havyaH . satyaH . satvaa . tuvi.akuurmiH . ekaH . chit . san . abhi.abhuutiH . 8.16.8
In Hindi:
ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : सः । स्तोम्यः॑ । सः । हव्यः॑ । स॒त्यः । सत्वा॑ । तु॒वि॒ऽकू॒र्मिः । एकः॑ । चि॒त् । सन् । अ॒भिऽभू॑तिः ॥ ८.१६.८
पदार्थ : (सः, स्तोम्यः) वह स्तुतियोग्य है (सः, हव्यः) वह हव्य=आह्वान योग्य है (सत्यः) सत्पुरुषों का पालक (सत्वा) असत्पुरुषों का अवसादक (तुविकूर्मिः) अनेक कर्मोंवाला (एकः, चित्, सन्) अकेला हो (अभिभूतिः) शत्रुओं का तिरस्कर्ता है ॥८॥
भावार्थ : वह पूर्ण परमात्मा सबका उपासनीय, तथा स्तुतियोग्य है, वही वेदविहित कर्म करनेवाले सत्पुरुषों का पालक, दुष्टों को दण्ड देनेवाला और विविध प्रकार के कर्मों का उत्पादक तथा पूर्ण करनेवाला है, अतएव प्रत्येक पुरुष को उचित है कि सदैव वेदविहित कर्मों का अनुष्ठान करते हुए उसी की शरण को प्राप्त हों ॥८ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : सः । स्तोम्यः॑ । सः । हव्यः॑ । स॒त्यः । सत्वा॑ । तु॒वि॒ऽकू॒र्मिः । एकः॑ । चि॒त् । सन् । अ॒भिऽभू॑तिः ॥ ८.१६.८
भावार्थ :