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Rigveda / 8 / 16 / 9

तम॒र्केभि॒स्तं साम॑भि॒स्तं गा॑य॒त्रैश्च॑र्ष॒णय॑: । इन्द्रं॑ वर्धन्ति क्षि॒तय॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 16 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः काण्वः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : तम् । अ॒र्केभिः॑ । तम् । साम॑ऽभिः । तम् । गा॒य॒त्रैः । च॒र्ष॒णयः॑ । इन्द्र॑म् । व॒र्ध॒न्ति॒ । क्षि॒तयः॑ ॥ ८.१६.९

पदार्थ : (चर्षणयः, क्षितयः) उसके द्रष्टा विद्वान् (तम्, इन्द्रम्) उस परमात्मा को (अर्केभिः) यजुर्मन्त्रों से (तम्, सामभिः) उसी को साम से (तम्, गायत्रैः) उसी को गायत्र्यादि सहित ऋचाओं से (वर्धन्ति) प्रकाशित करते हैं ॥९॥

भावार्थ : परमात्मा के द्रष्टा योगीजन, जिन्होंने उसके स्वरूप को भले प्रकार जाना है, वे उसको यजुरादि चारों वेदों से प्रकाशित करते हैं, क्योंकि परमात्मा का पूर्ण ज्ञान वेदों द्वारा ही हो सकता है । वेद परमात्मा की वाणी होने से उनमें वर्णित परमात्मा का स्वरूपज्ञान तथा उसकी महिमा का मान भले प्रकार होता है, अन्यथा नहीं, अतएव प्रत्येक पुरुष वेदों के अध्ययन द्वारा उसका स्वरूपज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करे ॥९ ॥