Rigveda / 8 / 19 / 11
यस्या॒ग्निर्वपु॑र्गृ॒हे स्तोमं॒ चनो॒ दधी॑त वि॒श्ववा॑र्यः । ह॒व्या वा॒ वेवि॑ष॒द्विष॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 11
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : agniH | Metre : viraaDuShnik | Tone : RRIShabhaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yasyaagnirvapurgRRihe stoma.m chano dadhiita vishvavaaryaH . havyaa vaa veviShadviShaH .
Component Words : yasya . agniH . vapuH . gRRihe . stomam . chanaH . dadhiita . vishva.avaaryaH . havyaa . vaa . veviShat . viShaH . 8.19.11
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः
विषय :
पदपाठ : यस्य॑ । अ॒ग्निः । वपुः॑ । गृ॒हे । स्तोम॑म् । चनः॑ । दधी॑त । वि॒श्वऽवा॑र्यः । ह॒व्या । वा॒ । वेवि॑षत् । विषः॑ ॥ ८.१९.११
पदार्थ : (अग्निः) परमात्मा (यस्य, गृहे) जिस उपासक के घर में (वपुः) रूप (स्तोमम्) स्तोत्र (चनः) और अन्नादि को (दधीत) धारण करे (वा) अथवा (विश्ववार्यः) सबका भजनीय परमात्मा (विषः) देवों के प्रति (हव्या, वेविषत्) हव्य पदार्थों को प्राप्त कराये, वह पूर्वोक्त फल को पाता है ॥११॥
भावार्थ : वह परमात्मा अपने उपासक को शुभकर्म में श्रद्धा उत्पन्न करके पुनः सन्मार्गगामी बनाता है, जिससे वह सर्वदा विविध देवों=विद्वानों की उपासना द्वारा शाश्वत सुख भोगता है अर्थात् वह उपासक विद्वानों की सेवा द्वारा उनसे अपूर्व ज्ञान प्राप्त करके यज्ञादि कर्मों द्वारा सब प्रकार का ऐश्वर्य्य प्राप्त करता है ॥११ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : विराडुष्निक् | स्वर : ऋषभः
पदपाठ : यस्य॑ । अ॒ग्निः । वपुः॑ । गृ॒हे । स्तोम॑म् । चनः॑ । दधी॑त । वि॒श्वऽवा॑र्यः । ह॒व्या । वा॒ । वेवि॑षत् । विषः॑ ॥ ८.१९.११
भावार्थ :