Rigveda / 8 / 19 / 12
विप्र॑स्य वा स्तुव॒तः स॑हसो यहो म॒क्षूत॑मस्य रा॒तिषु॑ । अ॒वोदे॑वमु॒परि॑मर्त्यं कृधि॒ वसो॑ विवि॒दुषो॒ वच॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 19 | Mantra No : 12
In English:
Seer : sobhariH kaaNvaH | Devta : agniH | Metre : nichRRitpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : viprasya vaa stuvataH sahaso yaho makShuutamasya raatiShu . avodevamuparimartya.m kRRidhi vaso vividuSho vachaH .
Component Words : viprasya . vaa . stuvataH . sahasaH . yaho iti . makShu.atamasya . raatiShu . avaH.adevam . upari.amartyam . kRRidhi . vaso iti . vividuShaH . vachaH . 8.19.12
In Hindi:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय :
पदपाठ : विप्र॑स्य । वा॒ । स्तु॒व॒तः । स॒ह॒सः॒ । य॒हो॒ इति॑ । म॒क्षुऽत॑मस्य । रा॒तिषु॑ । अ॒वःऽदे॑वम् । उ॒परि॑ऽमर्त्यम् । कृ॒धि॒ । वसो॒ इति॑ । वि॒वि॒दुषः॑ । वचः॑ ॥ ८.१९.१२
पदार्थ : (सहसः, यहो) अतिबल से साक्षात्कार होने के कारण बल के पुत्रसमान परमात्मन् (वसो) सम्पूर्ण जगत् को आच्छादन करके वर्तमान आप (स्तुवतः, विप्रस्य, वा) स्तुतिकर्ता विद्वान् के लिये अथवा (मक्षूतमस्य, रातिषु) दानयज्ञों में शीघ्रता करनेवाले यजमान के लिये (अवोदेवम्) दिव्य सूर्यादि पदार्थों के नीचे और (उपरिमर्त्यम्) भूलोक के ऊपर के विषय को (विविदुषः) जाननेवाले विद्वान् के लिये (वचः, कृधि) ज्ञानजनक वचनों का निर्माण करें ॥१२॥
भावार्थ : परमात्मध्यानपरायण मनुष्य अपने चित्त को शुद्ध=प्रतिष्ठित बनाकर पृथिवी से अन्तरिक्षपर्यन्त पदार्थों के ज्ञान में अथवा सदैव समृद्धि को प्राप्त करके विद्वानों के कर्म की सहायता में समर्थ होता है अर्थात् परमात्मदेव अपने उपासक तथा यज्ञों में दानदाता यजमान के लिये भूलोक तथा अन्तरिक्षलोक की विद्याओं का ज्ञाता बनाकर ऐश्वर्य्यसम्पन्न करता है ॥१२ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
पदपाठ : विप्र॑स्य । वा॒ । स्तु॒व॒तः । स॒ह॒सः॒ । य॒हो॒ इति॑ । म॒क्षुऽत॑मस्य । रा॒तिषु॑ । अ॒वःऽदे॑वम् । उ॒परि॑ऽमर्त्यम् । कृ॒धि॒ । वसो॒ इति॑ । वि॒वि॒दुषः॑ । वचः॑ ॥ ८.१९.१२
भावार्थ :