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Rigveda / 8 / 20 / 10

वृ॒ष॒ण॒श्वेन॑ मरुतो॒ वृष॑प्सुना॒ रथे॑न॒ वृष॑नाभिना । आ श्ये॒नासो॒ न प॒क्षिणो॒ वृथा॑ नरो ह॒व्या नो॑ वी॒तये॑ गत ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 8 | Sukta : 20 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : सोभरिः काण्वः | देवता : मरूतः | छन्द : सतःपङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय :

पदपाठ : वृ॒ष॒ण॒श्वेन॑ । म॒रु॒तः॒ । वृष॑ऽप्सुना । रथे॑न । वृष॑ऽनाभिना । आ । श्ये॒नासः॑ । न । प॒क्षिणः॑ । वृथा॑ । न॒रः॒ । ह॒व्या । नः॒ । वी॒तये॑ ग॒त॒ ॥ ८.२०.१०

पदार्थ : (नरः) हे नेता (मरुतः) शत्रुनाशक वीरो ! आप (वृषणश्वेन) इष्टगामी अश्वयुक्त (वृषप्सुना) कामनाप्रदरूप को धारण करनेवाले (वृषनाभिना) दृढ़नाभि=चक्रछिद्रवाले (रथेन) रथ द्वारा (नः) हमारे (हव्या, वीतये) हव्य=दातव्य भाग को सेवन करने के लिये (श्येनासः, पक्षिणः, न) श्येन पक्षी के समान निर्भीक होकर (आगत) आवें ॥१०॥

भावार्थ : हे शत्रुनाशक वीरो ! आप शीघ्रगामी रथों द्वारा अपना दातव्यभाग लेने के लिये शीघ्र आवें और श्येन=वाज के समान प्रतिपक्षियों को अपने आक्रमण से निर्बल करके सम्पूर्ण जनता से दातव्य भाग प्राप्त कर अपना कर्तव्य पालन करें अर्थात् हमारी सब ओर से रक्षा करते हुए हमें सुखसम्पन्न करें ॥१० ॥