Rigveda / 9 / 57 / 4
स नो॒ विश्वा॑ दि॒वो वसू॒तो पृ॑थि॒व्या अधि॑ । पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 57 | Mantra No : 4
In English:
Seer : avatsaaraH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : kakummatiigaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : sa no vishvaa divo vasuuto pRRithivyaa adhi . punaana indavaa bhara .
Component Words : saH . naH . vishvaa . divaH . vasu . uto iti . pRRithivyaaH . adhi . punaanaH . indo iti . aa . bhara . 9.57.4
In Hindi:
ऋषि : अवत्सारः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : ककुम्मतीगायत्री | स्वर : षड्जः
विषय :
पदपाठ : सः । नः॒ । विश्वा॑ । दि॒वः । वसु॑ । उ॒तो इति॑ । पृ॒थि॒व्याः । अधि॑ । पु॒नानः । इ॒न्दो॒ इति॑ । आ । भ॒र॒ ॥ ९.५७.४
पदार्थ : (इन्दो) हे परमात्मन् ! (सः) वह आप (नः) हमारे लिये (दिवः विश्वा वसु) द्युलोकसम्बन्धी सकल सम्पत्तियें (उतो) तथा (पृथिव्याः अधि) पृथिवीसम्बन्धी सम्पूर्ण सम्पत्तियें (आभर) आहरण कीजिये और (पुनानः) मुझको पवित्र करिये ॥४॥
भावार्थ : सम्पूर्ण सम्पत्तियों का स्वामी एकमात्र परमात्मा ही है, इसलिए ऐश्वर्यप्राप्ति के लिए उसी की शरणागत होना आवश्यक है ॥४॥ यह ५७ वाँ सूक्त और १४ वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
In Sanskrit:
ऋषि : अवत्सारः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : ककुम्मतीगायत्री | स्वर : षड्जः
पदपाठ : सः । नः॒ । विश्वा॑ । दि॒वः । वसु॑ । उ॒तो इति॑ । पृ॒थि॒व्याः । अधि॑ । पु॒नानः । इ॒न्दो॒ इति॑ । आ । भ॒र॒ ॥ ९.५७.४
भावार्थ :