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Rigveda / 9 / 58 / 1

तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति॒ धारा॑ सु॒तस्यान्ध॑सः । तर॒त्स म॒न्दी धा॑वति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 58 | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा का सर्वव्यापक होना वर्णन करते हैं।

पदपाठ : तर॑त् । सः । म॒न्दी । धा॒व॒ति॒ । धारा॑ । सु॒तस्य॑ । अन्ध॑सः । तर॑त् । सः । म॒न्दी । धा॒व॒ति॒ ॥ ९.५८.१

पदार्थ : (मन्दी सः) परम आनन्दमय यह परमात्मा (तरत्) पापियों को तारता हुआ (सुतस्य अन्धसः धारा) उत्पन्न किये हुए ब्रह्मानन्द के रससहित (धावति) स्तोताओं के हृदय में विराजमान होता है। (तरत् स मन्दी धावति) और वह परमात्मा निश्चय सब पापियों को तारता हुआ परमानन्दरूप से संसार में व्याप्त हो रहा है ॥१॥

भावार्थ : पापियों को तारने का अभिप्राय यह है कि जो लोग पाप का प्रायश्चित्त करके उसकी शरण को प्राप्त होते हैं, वे फिर कदापि पाप से पीड़ित नहीं होते। अथवा यों कहो कि पापमय संचित कर्मों की स्थिति उनके हृदय से दूर हो जाती है। अन्य पापों को ईश्वर कदापि क्षमा नहीं करता ॥१॥