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Rigveda / 9 / 61 / 4

पव॑मानस्य ते व॒यं प॒वित्र॑मभ्युन्द॒तः । स॒खि॒त्वमा वृ॑णीमहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 61 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : पव॑मानस्य । ते॒ । व॒यम् । प॒वित्र॑म् । अ॒भि॒ऽउ॒न्द॒तः । स॒खि॒ऽत्वम् । आ । वृ॒णी॒म॒ह्चे ॥ ९.६१.४

पदार्थ : (पवमानस्य) अपने आश्रित जनों को पवित्र करते हुए (पवित्रम् अभ्युदयन्तः) और पवित्र किये हुए मनुष्य को उत्साहित करनेवाले (ते) तुम्हारे (सखित्वम्) मैत्रीभाव के लिये (वयम्) हम लोग (आवृणीमहे) प्रार्थना करते हैं ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा के सद्गुणों को धारण करके परमात्मा के साथ मैत्री भाव का वर्णन किया गया है ॥४॥