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Rigveda / 9 / 61 / 5

ये ते॑ प॒वित्र॑मू॒र्मयो॑ऽभि॒क्षर॑न्ति॒ धार॑या । तेभि॑र्नः सोम मृळय ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 61 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अमहीयुः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय :

पदपाठ : ये । ते॒ । प॒वित्र॑म् । ऊ॒र्मयः॑ । अ॒भि॒ऽक्षर॑न्ति । धार॑या । तेभिः॑ । नः॒ । सो॒म॒ । मृ॒ळ॒य॒ ॥ ९.६१.५

पदार्थ : (सोम) हे सौम्यस्वभाव कर्मयोगिन् ! (ये ते ऊर्मयः) जो आपकी शरणरक्षक शक्तियें (पवित्रम्) शुद्ध हृदयवाले मनुष्य की ओर (धारया) प्रवाहरूप से (अभिक्षरन्ति) अभिगत होती हैं, (तेभिः) उन शक्तियों से (नः) हमको (मृळय) सुरक्षित करके सुखी करिये ॥५॥

भावार्थ : कर्म्मयोगी के उद्योगादि भावों को धारण करके स्वयं उद्योगी बनने का उपदेश इस मन्त्र में किया गया है ॥५॥