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Rigveda / 9 / 73 / 8

ऋ॒तस्य॑ गो॒पा न दभा॑य सु॒क्रतु॒स्त्री ष प॒वित्रा॑ हृ॒द्य१॒॑न्तरा द॑धे । वि॒द्वान्त्स विश्वा॒ भुव॑ना॒भि प॑श्य॒त्यवाजु॑ष्टान्विध्यति क॒र्ते अ॑व्र॒तान् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 73 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ऋ॒तस्य॑ । गो॒पाः । न । दभा॑य । सु॒ऽक्रतुः॑ । त्री । सः । प॒वित्रा॑ । हृ॒दि । अ॒न्तः । आ । द॒धे॒ । वि॒द्वान् । सः । विश्वा॑ । भुव॑ना । अ॒भि । प॒श्य॒ति॒ । अव॑ । अजु॑ष्टान् । वि॒ध्य॒ति । क॒र्ते । अ॒व्र॒तान् ॥ ९.७३.८

पदार्थ : (ऋतस्य गोपाः) सचाई की रक्षा करनेवाला (सुक्रतुः) शोभन कर्मोंवाला कर्मयोगी (न दभाय) जो किसी से दबाया नहीं जाता (सः) वह (पवित्रा) अपने पवित्र (हृद्यन्तः) अन्तःकरण में (त्री) परमात्मा की उत्पति-स्थिति-प्रलयरूप तीनों शक्तियों को (आ दधे) धारण करता है। (स विद्वान्) वह विद्वान् पुरुष (विश्वा भुवना) सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरों को (अभि पश्यति) देखता है और (कर्ते) कर्तव्य में (अव्रतान्) जो अव्रती (अजुष्टान्) और परमात्मा से वियुक्त हैं, उनको (अवविध्यति) मारता है ॥८॥

भावार्थ : जो लोग परमात्मा पर अटल विश्वास रखनेवाले हैं, वे किसी से दबाये नहीं जा सकते हैं ॥८॥