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Rigveda / 9 / 73 / 9

ऋ॒तस्य॒ तन्तु॒र्वित॑तः प॒वित्र॒ आ जि॒ह्वाया॒ अग्रे॒ वरु॑णस्य मा॒यया॑ । धीरा॑श्चि॒त्तत्स॒मिन॑क्षन्त आश॒तात्रा॑ क॒र्तमव॑ पदा॒त्यप्र॑भुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 73 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : ऋ॒तस्य॑ । तन्तुः॑ । विऽत॑तः । प॒वित्रे॑ । आ । जि॒ह्वायाः॑ । अग्रे॑ । वरु॑णस्य । मा॒यया॑ । धीराः॑ । चि॒त् । तत् । स॒म्ऽइन॑क्षन्तः । आ॒श॒त॒ । अत्र॑ । क॒र्तम् । अव॑ । प॒दा॒ति॒ । अप्र॑ऽभुः ॥ ९.७३.९

पदार्थ : (अप्रभुः) जो पुरुष कर्मयोगी नहीं है, वह (कर्तम् अव पदाति) कर्मरूप मार्ग से गिर जाता है। (अत्र) इस कर्म में (धीराश्चित्) कर्मयोगी पुरुष ही (तत्) उसके समक्ष (समिनक्षन्तः) गतिशील होकर (आशत) स्थिर होते हैं। (ऋतस्य) सच्चाई का (तन्तुः) विस्तार करनेवाला (विततः) जो विस्तृत है, वह परमात्मा (वरुणस्य मायया) सबको वशीभूत रखनेवाली अपनी शक्ति के साथ (पवित्रे) उसके पवित्र अन्तःकरण में और (जिह्वाया अग्रे) जिह्वा के अग्रभाग में (आ) निवास करता है ॥९॥

भावार्थ : जो कर्मयोगी और उद्योगी पुरुष है, उन्हीं के अन्तःकरण में परमात्मा निवास करता है ॥९॥ यह ७३ वाँ सूक्त और ३० वाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥