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Rigveda / 9 / 83 / 3

अरू॑रुचदु॒षस॒: पृश्नि॑रग्रि॒य उ॒क्षा बि॑भर्ति॒ भुव॑नानि वाज॒युः । मा॒या॒विनो॑ ममिरे अस्य मा॒यया॑ नृ॒चक्ष॑सः पि॒तरो॒ गर्भ॒मा द॑धुः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 83 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अरू॑रुचत् । उ॒षसः॑ । पृश्निः॑ । अ॒ग्रि॒यः । उ॒क्षा । बि॒भ॒र्ति॒ । भुव॑नानि । वा॒ज॒ऽयुः । मा॒या॒ऽविनः॑ । म॒मि॒रे॒ । अ॒स्य॒ । मा॒यया॑ । नृ॒ऽचक्ष॑सः । पि॒तरः॑ । गर्भ॑म् । आ । द॒धुः॒ ॥ ९.८३.३

पदार्थ : पूर्वोक्त परमात्मा (उषसः) सूर्य्य के प्रभामण्डल को (अरूरुचत्) प्रकाश करता है और (पृश्निः) प्रलयकाल में जो सबको भक्षण करे, उसका नाम पृष्णि है। (उक्षा) जो इस सम्पूर्ण संसार को अपने प्रेमवारि से सिञ्चित करे, उस महान् पुरुष का नाम उक्षा है (भुवनानि, बिभर्ति) वह सब भुवनों का भरण-पोषण करता है। (वाजयुः) सब बलों का आधार है। (अस्य, मायया) उसकी शक्ति से (मायाविनो ममिरे) मायावी लोक मर जाते हैं। (नृचक्षसः) वह सर्वज्ञ (पितरः) सबको उत्पन्न करनेवाला (गर्भं) इस संसाररूपी गर्भ को (आदधुः) धारण करता है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में परमात्मा के स्वरूप का वर्णन है कि वह प्रकाशस्वरूप है और लोक-लोकान्तरों का अधिष्ठान है। सब बलों का केन्द्र है और सब मायावियों की माया को मर्दन करनेवाला है। तात्पर्य यह है कि उसी पूर्ण पुरुष की उपासना से पुरुष तपस्वी बन सकता है ॥३॥