Rigveda / 9 / 83 / 4
ग॒न्ध॒र्व इ॒त्था प॒दम॑स्य रक्षति॒ पाति॑ दे॒वानां॒ जनि॑मा॒न्यद्भु॑तः । गृ॒भ्णाति॑ रि॒पुं नि॒धया॑ नि॒धाप॑तिः सु॒कृत्त॑मा॒ मधु॑नो भ॒क्षमा॑शत ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 83 | Mantra No : 4
In English:
Seer : pavitraH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : gandharva itthaa padamasya rakShati paati devaanaa.m janimaanyadbhutaH . gRRibhNaati ripu.m nidhayaa nidhaapatiH sukRRittamaa madhuno bhakShamaashata .
Component Words : gandharvaH . itthaa . padam . asya . rakShati . paati . devaanaam . janimaani . adbhutaH . gRRibhNaati . ripum . ni.adhayaa . nidhaa.apatiH . sukRRit.atamaaH . madhunaH . bhakSham . aashata . 9.83.4
In Hindi:
ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : ग॒न्ध॒र्वः । इ॒त्था । प॒दम् । अ॒स्य॒ । र॒क्ष॒ति॒ । पाति॑ । दे॒वाना॑म् । जनि॑मानि । अद्भु॑तः । गृ॒भ्णाति॑ । रि॒पुम् । नि॒ऽधया॑ । नि॒धाऽप॑तिः । सु॒कृत्ऽत॑माः । मधु॑नः । भ॒क्षम् । आ॒श॒त॒ ॥ ९.८३.४
पदार्थ : (गन्धर्वः) जो पृथिव्यादि लोक-लोकान्तरों को धारण करे, उसका नाम यहाँ गन्धर्व है। (इत्था) वह सत्यरूप परमात्मा (देवानां, जनिमानि) विद्वानों के जन्म की (रक्षति) रक्षा करता है। (अद्भुतः) बड़ा है (निधापतिः) सब शक्तियों का पति (निधया) अपनी शक्ति से (रिपुं) अपने से प्रतिकूल शक्तिवाले शत्रु को (गृभ्णाति) स्वाधीन करता है। (अस्य मधुनः पदं) इस आनन्दमय परमात्मा के पद को (सुकृत्तमाः) पुण्यात्मा लोग (भक्षं) भोग्य बनाकर (आशत) स्थिर होते हैं और वह उक्त उपासकों की (पाति) रक्षा करता है ॥४॥
भावार्थ : “तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” उस विष्णु के परमपद को सदा विद्वान् लोग देखते हैं। उसी व्यापक परमात्मा के परमपद का इस मन्त्र में वर्णन किया है कि उस परमात्मा के उपासक लोग ब्रह्मानन्द को भोगते हैं, अन्य नहीं ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : पवित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : ग॒न्ध॒र्वः । इ॒त्था । प॒दम् । अ॒स्य॒ । र॒क्ष॒ति॒ । पाति॑ । दे॒वाना॑म् । जनि॑मानि । अद्भु॑तः । गृ॒भ्णाति॑ । रि॒पुम् । नि॒ऽधया॑ । नि॒धाऽप॑तिः । सु॒कृत्ऽत॑माः । मधु॑नः । भ॒क्षम् । आ॒श॒त॒ ॥ ९.८३.४
भावार्थ :