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Rigveda / 9 / 85 / 7

अत्यं॑ मृजन्ति क॒लशे॒ दश॒ क्षिप॒: प्र विप्रा॑णां म॒तयो॒ वाच॑ ईरते । पव॑माना अ॒भ्य॑र्षन्ति सुष्टु॒तिमेन्द्रं॑ विशन्ति मदि॒रास॒ इन्द॑वः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 85 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वेनो भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अत्य॑म् । मृ॒ज॒न्ति॒ । क॒लशे॑ । दश॑ । क्षिपः॑ । प्र । विप्रा॑णाम् । म॒तयः॑ । वाचः॑ । ई॒र॒ते॒ । पव॑मानाः । अ॒भि । अ॒र्ष॒न्ति॒ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । आ । इन्द्र॑म् । वि॒श॒न्ति॒ । म॒दि॒रासः॑ । इन्द॑वः ॥ ९.८५.७

पदार्थ : (मदिरास इन्दवः) आनन्द के वर्द्धक और ज्ञान के प्रकाशस्वभाव (इन्द्रमाविशन्ति) कर्म्मयोगी को आकर प्राप्त होते हैं। जो कर्म्मयोगी (सुस्तुतिं) सुन्दरस्तुति करनेवाला है, उसको (पवमानः) परमात्मा के पवित्रभाव (अभ्यर्षन्ति) प्राप्त होते हैं। उसके (कलशे) अन्तःकरण में (दश क्षिपः) दश प्राण (अत्यं) गतिशील परमात्मा को (मृजन्ति) साक्षात्कार करते हैं। (विप्राणां मतयः) विज्ञानी पुरुषों की बुद्धियें (वाच ईरते) उस परमात्मा में वाणियों का प्रयोग करती हैं ॥७॥

भावार्थ :