Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 9 / 85 / 8

पव॑मानो अ॒भ्य॑र्षा सु॒वीर्य॑मु॒र्वीं गव्यू॑तिं॒ महि॒ शर्म॑ स॒प्रथ॑: । माकि॑र्नो अ॒स्य परि॑षूतिरीश॒तेन्दो॒ जये॑म॒ त्वया॒ धनं॑धनम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 85 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वेनो भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : पव॑मानः । अ॒भि । अ॒र्ष॒ । सु॒ऽवीर्य॑म् । उ॒र्वीम् । गव्यू॑तिम् । महि॑ । शर्म॑ । स॒ऽप्रथः॑ । माकिः॑ । नः॒ । अ॒स्य । परि॑ऽसूतिः । ई॒श॒त॒ । इन्दो॒ इति॑ । जये॑म । त्वया॑ । धन॑म्ऽधनम् ॥ ९.८५.८

पदार्थ : (पवमानाः) हे सबको पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! (सुवीर्यमुर्वीम्) बल के देनेवाले विस्तृतमार्ग को जो (गव्यूतिं) इन्द्रियों का ज्ञानमार्ग है, उसको देकर हे परमात्मन् ! आप (महि) महत् (सप्रथः) सब प्रकार से बड़ा (शर्म्म) सुख (अभ्यर्ष) दें। (इन्दो) हे सर्वप्रकाशक परमात्मन् ! (परिषूतिरीशत) किसी का द्वेषी (नः) हमको (माकिः) मत करो और (त्वया) तुम्हारे से उत्पन्न किये हुए (अस्य) इस संसार के (धनं धनं) सब धन को (जयेम) हम जीतें ॥८॥

भावार्थ : जिन लोगों के ऐश्वर्य्यसम्बन्धी इन्द्रिय विशाल होते हैं, वे किसी के साथ द्वेष नहीं करते और बुद्धिबल के ही सब ऐश्वर्य्य उनके अधीन हो जाते हैं ॥८॥