Rigveda / 9 / 86 / 46
अस॑र्जि स्क॒म्भो दि॒व उद्य॑तो॒ मद॒: परि॑ त्रि॒धातु॒र्भुव॑नान्यर्षति । अं॒शुं रि॑हन्ति म॒तय॒: पनि॑प्नतं गि॒रा यदि॑ नि॒र्णिज॑मृ॒ग्मिणो॑ य॒युः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 46
In English:
Seer : gRRitsamadaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : asarji skambho diva udyato madaH pari tridhaaturbhuvanaanyarShati . a.mshu.m rihanti matayaH panipnata.m giraa yadi nirNijamRRigmiNo yayuH .
Component Words : asarji . skambhaH . divaH . ut.ayataH . madaH . pari . tri.adhaatuH . bhuvanaani . arShati . a.mshum . rihanti . matayaH . panipnatam . giraa . yadi . niH.anijam . RRIgmiNaH . yayuH . 9.86.46
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : अस॑र्जि । स्क॒म्भः । दि॒वः । उत्ऽय॑तः । मदः॑ । परि॑ । त्रि॒ऽधातुः । भुव॑नानि । अ॒र्ष॒ति॒ । अं॒शुम् । रि॒ह॒न्ति॒ । म॒तयः॑ । पनि॑प्नतम् । गि॒रा । यदि॑ । निः॒ऽनिज॑म् । ऋ॒ग्मिणः॑ । य॒युः ॥ ९.८६.४६
पदार्थ : जो परमात्मा (दिवः स्कम्भः) द्युलोक का आधार है और (त्रिधातुर्भुवनानि) प्रकृति के तीनों गुणों के कार्य जो लोक हैं, उनको (पर्यर्षति) चलानेवाला है और (मदः) आनन्दस्वरूप है तथा (उद्यतः) अपनी सत्ता से सदैव जीवित जागृत है, (असर्जि) उसने इन लोक-लोकान्तरों को रचा। (अशुं) उस गतिशील (पनिप्नतं) शब्दायमान परमात्मा को (मतयः) बुद्धिमान् (गिरा) वेदवाणी द्वारा (रिहन्ति) साक्षात्कार करते हैं। कब-२ (यदि) जब-२ (निर्णिजं) उस शुद्धस्वरूप को (ऋग्मिणः) स्तोता लोग स्तुति द्वारा (ययुः) प्राप्त होते हैं ॥४६॥
भावार्थ : जब उपासक शुद्धभाव से उसका स्वतन करता है, तो उसकी प्राप्ति अवश्यमेव होती है ॥४६॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : अस॑र्जि । स्क॒म्भः । दि॒वः । उत्ऽय॑तः । मदः॑ । परि॑ । त्रि॒ऽधातुः । भुव॑नानि । अ॒र्ष॒ति॒ । अं॒शुम् । रि॒ह॒न्ति॒ । म॒तयः॑ । पनि॑प्नतम् । गि॒रा । यदि॑ । निः॒ऽनिज॑म् । ऋ॒ग्मिणः॑ । य॒युः ॥ ९.८६.४६
भावार्थ :