Rigveda / 9 / 86 / 47
प्र ते॒ धारा॒ अत्यण्वा॑नि मे॒ष्य॑: पुना॒नस्य॑ सं॒यतो॑ यन्ति॒ रंह॑यः । यद्गोभि॑रिन्दो च॒म्वो॑: सम॒ज्यस॒ आ सु॑वा॒नः सो॑म क॒लशे॑षु सीदसि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 86 | Mantra No : 47
In English:
Seer : gRRitsamadaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : viraaDjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : pra te dhaaraa atyaNvaani meShyaH punaanasya sa.myato yanti ra.mhayaH . yadgobhirindo chamvoH samajyasa aa suvaanaH soma kalasheShu siidasi .
Component Words : pra . te . dhaaraaH . ati . aNvaani . meShyaH . punaanasya . sam.ayataH . yanti . ra.mhayaH . yat . go.abhiH . indo iti . chamvoH . sam.aajyase . aa . suvaanaH . soma . kalasheShu . siidasi . 9.86.47
In Hindi:
ऋषि : गृत्समदः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : प्र । ते॒ । धाराः॑ । अति॑ । अण्वा॑नि । मे॒ष्यः॑ । पु॒ना॒नस्य॑ । स॒म्ऽयतः॑ । य॒न्ति॒ । रंह॑यः । यत् । गोऽभिः॑ । इ॒न्दो॒ इति॑ । च॒म्वोः॑ । स॒म्ऽअ॒ज्यसे॑ । आ । सु॒वा॒नः । सो॒म॒ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒सि॒ ॥ ९.८६.४७
पदार्थ : (इन्दो) हे प्रकाशस्वरूपपरमात्मन् ! (यद्) जब आप (गोभिः) ज्ञानी पुरुषों द्वारा (चम्वोः) आध्यात्मिक वृत्तियों की सेना के सम्बन्ध में (समज्यसे) उपासना किये जाते हो, तब आप (आसुवानः) सर्वव्यापक (सोम) हे शान्तिस्वरूप परमात्मन् ! (कलशेषु) उपासकों के अन्तःकरणों में (सीदसि) विराजमान होते हो और (ते धाराः) तुम्हारी प्रेम की धारायें (अत्यण्वानि) जो सूक्ष्म हैं, (संयतः) संयमी पुरुष को (पुनानस्य) जो सदुपदेश द्वारा सबको पवित्र करनेवाला है उसको (यन्ति) प्राप्त होती हैं, जो प्रेमधारायें (रंहयः) गतिशील हैं ॥४७॥
भावार्थ : जब उपासक बाह्यवृत्तियों का निरोध करके अन्तर्मुख होकर परमात्मा का ध्यान करता है, तो वह परमात्मा के साक्षात्कार को अवश्यमेव प्राप्त होता है ॥४७॥
In Sanskrit:
ऋषि : गृत्समदः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : प्र । ते॒ । धाराः॑ । अति॑ । अण्वा॑नि । मे॒ष्यः॑ । पु॒ना॒नस्य॑ । स॒म्ऽयतः॑ । य॒न्ति॒ । रंह॑यः । यत् । गोऽभिः॑ । इ॒न्दो॒ इति॑ । च॒म्वोः॑ । स॒म्ऽअ॒ज्यसे॑ । आ । सु॒वा॒नः । सो॒म॒ । क॒लशे॑षु । सी॒द॒सि॒ ॥ ९.८६.४७
भावार्थ :