Rigveda / 9 / 88 / 5
अ॒ग्निर्न यो वन॒ आ सृ॒ज्यमा॑नो॒ वृथा॒ पाजां॑सि कृणुते न॒दीषु॑ । जनो॒ न युध्वा॑ मह॒त उ॑प॒ब्दिरिय॑र्ति॒ सोम॒: पव॑मान ऊ॒र्मिम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 88 | Mantra No : 5
In English:
Seer : ushanaaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : agnirna yo vana aa sRRijyamaano vRRithaa paajaa.msi kRRiNute nadiiShu . jano na yudhvaa mahata upabdiriyarti somaH pavamaana uurmim .
Component Words : agniH . na . yaH . vane . aa . sRRijyamaanaH . vRRithaa . paajaa.msi . kRRiNute . nadiiShu . janaH . na . yudhvaa . mahataH . upabdiH . iyarti . somaH . pavamaanaH . uurmim . 9.88.5
In Hindi:
ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : अ॒ग्निः । न । यः । वने॑ । आ । सृ॒ज्यमा॑नः । वृथा॑ । पाजां॑सि । कृ॒णु॒ते॒ । न॒दीषु॑ । जनः॑ । न । युध्वा॑ । म॒ह॒तः । उ॒प॒ब्दिः । इय॑र्ति । सोमः॑ । पव॑मानः । ऊ॒र्मिम् ॥ ९.८८.५
पदार्थ : (यः) जो सोम (सृज्यमानः अग्निर्न) उत्पन्न की हुई अग्नि के समान (वने) वन में (पाजांसि) बलों को (वृथा कृणुते) व्यर्थ कर देता है। (नदीषु) अन्तरिक्षों में (पाजांसि) जल के बलों को (वृथा कृणुते) व्यर्थ कर देता है। (जनो न) जिस प्रकार मनुष्य (युद्ध्वा) युद्ध करके (महत उपब्दिः) बड़ा शब्द करता हुआ (इयर्ति) प्रेरणा करता है, इसी प्रकार (पवमानः) सबको पवित्र करनेवाला (सोमः) सोम (ऊर्म्मिम्) आनन्द की लहरों को बहाता है ॥५॥
भावार्थ : अग्नि जिस प्रकार सब तेजों को तिरस्कृत करके अपने में मिला लेता है अर्थात् विद्युदादि तेज जैसे अन्य तुच्छ तेजों को तिरस्कृत कर देता है, इसी प्रकार परमात्मा के समक्ष सब तेज तुच्छ हैं अर्थात् परमात्मा ही सब ज्योतियों की ज्योति होने से स्वयंज्योति है ॥५॥
In Sanskrit:
ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : अ॒ग्निः । न । यः । वने॑ । आ । सृ॒ज्यमा॑नः । वृथा॑ । पाजां॑सि । कृ॒णु॒ते॒ । न॒दीषु॑ । जनः॑ । न । युध्वा॑ । म॒ह॒तः । उ॒प॒ब्दिः । इय॑र्ति । सोमः॑ । पव॑मानः । ऊ॒र्मिम् ॥ ९.८८.५
भावार्थ :