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Rigveda / 9 / 88 / 6

ए॒ते सोमा॒ अति॒ वारा॒ण्यव्या॑ दि॒व्या न कोशा॑सो अ॒भ्रव॑र्षाः । वृथा॑ समु॒द्रं सिन्ध॑वो॒ न नीची॑: सु॒तासो॑ अ॒भि क॒लशाँ॑ असृग्रन् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 9 | Sukta : 88 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : उशनाः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ए॒ते । सोमाः॑ । अति॑ । वारा॑णि । अव्या॑ । दि॒व्या । न । कोशा॑सः । अ॒भ्रऽव॑र्षाः । वृथा॑ । स॒मु॒द्रम् । सिन्ध॑वः । न । नीचीः॑ । सु॒तासः॑ । अ॒भि । क॒लशा॑न् । अ॒सृ॒ग्र॒न् ॥ ९.८८.६

पदार्थ : (एते सोमाः) उक्त परमात्मा के सोमादि गुण (वाराण्यव्या) वरणीय और रक्षणीय दिव्यादिव्य पदार्थों को (कोशासः) पात्रों को (अभ्रवर्षाः, न) मेघ की वर्षा के समान परिपूर्ण कर देते हैं और (वृथा) जैसे अनायास से ही (समुद्रं) अन्तरिक्ष को (सिन्धवः) स्यन्दनशील प्रकृति के सत्त्वादिक गुण प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार (नीचीर्न) नीचाई की ओर (सुतासः) आविर्भाव को प्राप्त हुए गुण (कलशान्) शुद्ध अन्तःकरणों की (अभि, असृग्रन्) ओर भली-भाँति गमन करते हैं ॥६॥

भावार्थ : जिन पुरुषों का अन्तःकरण पवित्र है, अर्थात् जिन्होंने श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन द्वारा अपने अन्तःकरणों को शुद्ध किया है, परमात्मा के ज्ञान का प्रवाह उनके अन्तःकरणों की ओर स्वतः ही प्रवाहित होता है ॥६॥