Rigveda / 10 / 13 / 2
य॒मे इ॑व॒ यत॑माने॒ यदैतं॒ प्र वां॑ भर॒न्मानु॑षा देव॒यन्त॑: । आ सी॑दतं॒ स्वमु॑ लो॒कं विदा॑ने स्वास॒स्थे भ॑वत॒मिन्द॑वे नः ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 13 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vivasvaanaadityaH | Devta : havirdhaane | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : yame iva yatamaane yadaita.m pra vaa.m bharanmaanuShaa devayantaH . aa siidata.m svamu loka.m vidaane svaasasthe bhavatamindave naH .
Component Words : yame iveti yame.aiva . yatamaane iti . yat . aitam . pra . vaam . bharan . maanuShaaH . deva.ayantaH . aa . siidatam . svam . uu.N iti . lokam . vidaane iti . svaasasthe iti su.aaasasthe . bhavatam . indave . naH . 10.13.2
In Hindi:
ऋषि : विवस्वानादित्यः | देवता : हविर्धाने | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : य॒मे इ॒वेति॑ य॒मेऽइ॑व । यत॑माने॒ इति॑ । यत् । ऐत॑म् । प्र । वा॒म् । भ॒र॒न् । मानु॑षाः । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । आ । सी॒द॒त॒म् । स्वम् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । विदा॑ने॒ इति॑ । स्वा॒स॒स्थे इति॑ सु॒ऽआ॒स॒स्थे । भ॒व॒त॒म् । इन्द॑वे । नः॒ ॥ १०.१३.२
पदार्थ : (यमे-इव यतमाने यत्-ऐतम्) हे वधूवरो ! तुम जैसे माता के उदर से दो युगल कन्यायें परस्पर बन्धन में बद्ध होकर उत्पन्न होती हैं, वैसे तुम वेदी पर प्राप्त होओ (मानुषाः देवयन्तः वां प्रभरन्) तब परमात्मा को चाहते हुए आस्तिक जन तुम्हारा प्रकृष्टरूप से भरण-पोषण और अनुमोदन करते हैं (स्वं लोकम्-उ-आसीदतम्) अतः तुम विवाह के अनन्तर अपने घर को भलीभाँति प्राप्त होओ, और वहाँ जाकर (विदाने स्वासस्थे) स्वात्मा में द्युलोक और पृथिवीलोक जैसे प्रतिष्ठित हुए अपने को समझो (नः-इन्दवे भवतम्) हमारे यज्ञ-श्रेष्ठकर्म को साधने के लिए सहयोगी होओ ॥२॥
भावार्थ : विवाह को चुकने पर गृहस्थ बन्धन में जब स्त्री-पुरुष बँध जावें, तो आस्तिक जन उनका अनुमोदन करें और वे अपने घर में गृहस्थ को चलाने के लिए जैसे द्युलोक पृथिवीलोक संसार को चलाते हैं, ऐसे अपने को समझकर स्थिर रहें। इस प्रकार अन्य गृहस्थ आश्रमियों की भाँति यज्ञादि श्रेष्ठकर्म करते रहें ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : विवस्वानादित्यः | देवता : हविर्धाने | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : य॒मे इ॒वेति॑ य॒मेऽइ॑व । यत॑माने॒ इति॑ । यत् । ऐत॑म् । प्र । वा॒म् । भ॒र॒न् । मानु॑षाः । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । आ । सी॒द॒त॒म् । स्वम् । ऊँ॒ इति॑ । लो॒कम् । विदा॑ने॒ इति॑ । स्वा॒स॒स्थे इति॑ सु॒ऽआ॒स॒स्थे । भ॒व॒त॒म् । इन्द॑वे । नः॒ ॥ १०.१३.२
भावार्थ :