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Rigveda / 10 / 13 / 3

पञ्च॑ प॒दानि॑ रु॒पो अन्व॑रोहं॒ चतु॑ष्पदी॒मन्वे॑मि व्र॒तेन॑ । अ॒क्षरे॑ण॒ प्रति॑ मिम ए॒तामृ॒तस्य॒ नाभा॒वधि॒ सं पु॑नामि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 13 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : विवस्वानादित्यः | देवता : हविर्धाने | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : पञ्च॑ । प॒दानि॑ । रु॒पः । अनु॑ । अ॒रो॒ह॒म् । चतुः॑ऽपदीम् । अनु॑ । ए॒मि॒ । व्र॒तेन॑ । अ॒क्षरे॑ण । प्रति॑ । मि॒मे॒ । ए॒ताम् । ऋ॒तस्य॑ । नाभौ॑ । अधि॑ । सम् । पु॒ना॒मि॒ ॥ १०.१३.३

पदार्थ : (रूपः-पञ्च पदानि-अनु-अरोहम्) शरीर में विमोह को प्राप्त हुआ मैं गृहस्थाश्रम से निवृत्त-विरक्त हुआ अपने को वानप्रस्थ अनुभव करता हूँ, अत एव शरीर के पाँच कोशों को मैं लाँघ चुका हूँ- लाँघता हूँ (व्रतेन चतुष्पदीम्-अन्वेमि) योगाभ्यासरूप सद्व्रत के द्वारा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीय अवस्थाओं में तुरीय अवस्था को अनुभव करता हूँ, तब (एताम्-अक्षरेण प्रतिमिमे) इस अवस्था को ‘ओ३म्’ इस अक्षर अर्थात् अविनाशी ब्रह्म के साथ संयोग-सादृश्य को प्राप्त होता हूँ, इस प्रकार (ऋतस्य नाभौ-अधि सम् पुनामि) अध्यात्मयज्ञ के मध्य में अपने स्वात्मा को सम्यक् निर्मल करता हूँ ॥३॥

भावार्थ : मानव को गृहस्थ आश्रम पूरा करने के पश्चात् वैराग्यवान्-वानप्रस्थ होकर पाँच कोशों का अनुभव करना चाहिए तथा जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं में भी चलते हुए योगाभ्यास के द्वारा ‘ओ३म्’ अविनाशी ब्रह्म के साथ अपनी सङ्गतिरूप अध्यात्मयज्ञ के अन्दर अपने को पवित्र करना चाहिए ॥३॥