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Rigveda / 10 / 14 / 6

अङ्गि॑रसो नः पि॒तरो॒ नव॑ग्वा॒ अथ॑र्वाणो॒ भृग॑वः सो॒म्यास॑: । तेषां॑ व॒यं सु॑म॒तौ य॒ज्ञिया॑ना॒मपि॑ भ॒द्रे सौ॑मन॒से स्या॑म ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : लिङ्गोक्ताः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अङ्गि॑रसः । नः॒ । पि॒तरः॑ । नव॑ऽग्वाः । अथ॑र्वाणः । भृग॑वः । सो॒म्यासः॑ । तेषा॑म् । व॒यम् । सु॒ऽम॒तौ । य॒ज्ञिया॑नाम् । अपि॑ । भ॒द्रे । सौ॒म॒न॒से । स्या॒म॒ ॥ १०.१४.६

पदार्थ : (अङ्गिरसः पितरः-नवग्वाः-अथर्वाणः) ग्रीष्म ऋतु सम्बन्धी सूर्यरश्मियाँ वर्षाऋतु सम्बन्धी सूर्यकिरणों, शरदृतु संबन्धी भानुरश्मियाँ, हेमन्तऋतु संबन्धी दिवाकर किरणें, शिशिरऋतु संबन्धी सूर्यरश्मियाँ, वसन्तऋतु संबन्धी आदित्यकिरणें, हमारे जीवन के लिये हैं (तेषां यज्ञियानां सुमतौ भद्रे-अपि सौमनसे वयं स्याम) उन यज्ञयोग्य सूर्यकिरणों के विचारणीय विज्ञानव्यवहार में हम कल्याण मन से सुखयुक्त होकर रहें ॥६॥ प्रत्येक ऋतु को स्वानुकुल और सुखमय बनाने के लिए पुष्कल ऋतुयोग करने चाहियें ॥६॥

भावार्थ :