Rigveda / 10 / 14 / 7
प्रेहि॒ प्रेहि॑ प॒थिभि॑: पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ न॒: पूर्वे॑ पि॒तर॑: परे॒युः । उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वम् ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 7
In English:
Seer : yamaH | Devta : li~NgoktaaH pitaro vaa | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : prehi prehi pathibhiH puurvyebhiryatraa naH puurve pitaraH pareyuH . ubhaa raajaanaa svadhayaa madantaa yama.m pashyaasi varuNa.m cha devam .
Component Words : pra . ihi . pra . ihi . pathi.abhiH . puurvyebhiH . yatra . naH . puurve . pitaraH . paraa.aiiyuH . ubhaa . raajaanaa . svadhayaa . madantaa . yamam . pashyaasi . varuNam . cha . devam . 10.14.7
In Hindi:
ऋषि : यमः | देवता : लिङ्गोक्ताः पितरो वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : प्र । इ॒हि॒ । प्र । इ॒हि॒ । प॒थिऽभिः॑ । पू॒र्व्येभिः॑ । यत्र॑ । नः॒ । पूर्वे॑ । पि॒तरः॑ । प॒रा॒ऽई॒युः । उ॒भा । राजा॑ना । स्व॒धया॑ । मद॑न्ता । य॒मम् । प॒श्या॒सि॒ । वरु॑णम् । च॒ । दे॒वम् ॥ १०.१४.७
पदार्थ : (पूर्व्येभिः पथिभिः प्रेहि प्रेहि) पूर्वोत्पन्न बड़े लोगों के बनाये मर्यादित किये हुए जीवनयात्रा सम्बन्धी इष्टापूर्त्त आदि आचरणरूप मार्गों से हे जीव ! तू जीवनान्त को पुनः-पुनः या नित्य प्राप्त कर (यत्र नः पूर्वे पितरः परेयुः) जिन मार्गों में वर्त्तमान हुए हमारे पालक जन जीवनान्त आयु की पूर्णता को प्राप्त हुए हैं, (स्वधया मदन्ता-उभा राजाना यमं वरुणं च देवं पश्यासि) जल के द्वारा तुझे संतुष्ट करते हुए दोनों राजमान बड़ी सत्तावाले सर्वत्र व्याप्त सब पदार्थों को स्ववश करनेवाले अन्तकारी काल तथा जन्म के अधिष्ठाता नूतन उत्पत्ति के लिये सब को वरनेवाले आकाश में वर्तमान सूक्ष्म जलरूप वरुणदेव को तू देख। यह एक आन्तरिक विचाररूप उपदेश है ॥७॥
भावार्थ : जीव का आयु को पूर्ण करके मृत्युरूप अन्तकाल और फिर पुनर्जन्म के लिये मेघ के सूक्ष्म जलरूप वरुण का प्राप्त करना अनिवार्य है। अतः जीवन की अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए उत्तम कर्ममार्गों पर चलना चाहिये ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : यमः | देवता : लिङ्गोक्ताः पितरो वा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : प्र । इ॒हि॒ । प्र । इ॒हि॒ । प॒थिऽभिः॑ । पू॒र्व्येभिः॑ । यत्र॑ । नः॒ । पूर्वे॑ । पि॒तरः॑ । प॒रा॒ऽई॒युः । उ॒भा । राजा॑ना । स्व॒धया॑ । मद॑न्ता । य॒मम् । प॒श्या॒सि॒ । वरु॑णम् । च॒ । दे॒वम् ॥ १०.१४.७
भावार्थ :