Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 14 / 8

सं ग॑च्छस्व पि॒तृभि॒: सं य॒मेने॑ष्टापू॒र्तेन॑ पर॒मे व्यो॑मन् । हि॒त्वाया॑व॒द्यं पुन॒रस्त॒मेहि॒ सं ग॑च्छस्व त॒न्वा॑ सु॒वर्चा॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : लिङ्गोक्ताः पितरो वा | छन्द : स्वराडार्चीत्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सम् । ग॒च्छ॒स्व॒ । पि॒तृऽभिः॑ । सम् । य॒मेन॑ । इ॒ष्टा॒पू॒र्तेन॑ । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् । हि॒त्वाय॑ । अ॒व॒द्यम् । पुनः॑ । अस्त॑म् । आ । इ॒हि॒ । सम् । ग॒च्छ॒स्व॒ । त॒न्वा॑ । सु॒ऽवर्चाः॑ ॥ १०.१४.८

पदार्थ : (परमे व्योमन् पितृभिः सङ्गच्छस्व यमेन-इष्टापूर्तेन सम्) हृदयाकाश में वर्तमान हुए हे जीव ! तू प्राणों के साथ सङ्गत हो जा और वहीं जीवनकाल के साथ भी सङ्गत हो। इष्टापूर्त यज्ञादि रूप सञ्चित किये धर्मधन के साथ सङ्गति कर, जो तेरा सच्चा मित्र है और मरने पर साथ जाता है (अवद्यं हित्वाय पुनः-अस्तम्-एहि सुवर्चाः तन्वा सङ्गच्छस्व) गर्ह्य अर्थात् म्रियमाण या मरणधर्मी शरीर को छोड़कर पुनर्जन्म को प्राप्त हो और उस पुनर्जन्म में सुन्दर शरीर के साथ युक्त हो जा ॥८॥

भावार्थ : प्रत्येक जीव वर्तमान देहपात के अनन्तर पुनः प्राणों और जीवनकाल से सङ्गत होता है और कर्मों के अनुसार पुनः नूतन नाड़ी आदि से युक्त शरीर को धारण करता है ॥८॥