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Rigveda / 10 / 14 / 10

अति॑ द्रव सारमे॒यौ श्वानौ॑ चतुर॒क्षौ श॒बलौ॑ सा॒धुना॑ प॒था । अथा॑ पि॒तॄन्त्सु॑वि॒दत्राँ॒ उपे॑हि य॒मेन॒ ये स॑ध॒मादं॒ मद॑न्ति ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : श्वानौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : अति॑ । द्र॒व॒ । सा॒र॒मे॒यौ । श्वानौ॑ । च॒तुः॒ऽअ॒क्षौ । श॒बलौ॑ । सा॒धुना॑ । प॒था । अथ॑ । पि॒तॄन् । सु॒ऽवि॒दत्रा॑न् । उप॑ । इ॒हि॒ । य॒मेन॑ । ये । स॒ध॒ऽमाद॑म् । मद॑न्ति ॥ १०.१४.१०

पदार्थ : (साधुना पथा चतुरक्षौ शबलौ सारमेयौ श्वानौ अतिद्रव) हे जीव ! तू उचित मार्ग से चार प्रहररूप चार आँखोंवाले, सूर्य तथा चन्द्रप्रकाश से चित्र रङ्गयुक्त उषा-पुत्रों-दिन और रात को समीचीनरूप से प्राप्त हो (अथ सुविदत्रान्) इसके पश्चात् कल्याणसम्पादक ऋतुसहचरित सूर्य की रश्मियों को प्राप्त कर जो समय के साथ सदा सहयोग रखती हैं ॥१०॥

भावार्थ : देहान्त के पश्चात् जीव शीघ्र-शीघ्र दिन रातों को सूर्यरश्मियों द्वारा पुनर्जन्मार्थ प्राप्त होता है ॥१०॥