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Rigveda / 10 / 14 / 11

यौ ते॒ श्वानौ॑ यम रक्षि॒तारौ॑ चतुर॒क्षौ प॑थि॒रक्षी॑ नृ॒चक्ष॑सौ । ताभ्या॑मेनं॒ परि॑ देहि राजन्त्स्व॒स्ति चा॑स्मा अनमी॒वं च॑ धेहि ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 14 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : यमः | देवता : श्वानौ | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यौ । ते॒ । श्वानौ॑ । य॒म॒ । र॒क्षि॒तारौ॑ । च॒तुः॒ऽअ॒क्षौ । प॒थि॒रक्षी॒ इति॑ पथिऽरक्षी॑ । नृ॒ऽचक्ष॑सौ । ताभ्या॑म् । ए॒न॒म् । परि॑ । दे॒हि॒ । रा॒ज॒न् । स्व॒स्ति । च॒ । अ॒स्मै॒ । अ॒न॒मी॒वम् । च॒ । धे॒हि॒ ॥ १०.१४.११

पदार्थ : (यम ते यौ रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिरक्षी नृचक्षसौ श्वानौ) हे समय ! तेरे जो रक्षक चारप्रहररूप चार आँखोंवाले मार्गपाल प्राणियों के सदा दर्शक श्वान तुल्य प्रत्येक जीव के पीछे-पीछे चलनेवाले दिन और रात हैं (ताभ्याम्-एनं परिदेहि) उन दिन-रातों के साथ इस जीव को पुनर्जन्म के लिये छोड़ (राजन्-अस्मै स्वस्ति च-अनमीवं च धेहि) हे राजन् ! इस जीव के लिये सत्तारूप स्वस्ति और नीरोगता का सम्पादन कर ॥११॥

भावार्थ : जीव का जीवनसमय समाप्त हो जाने पर फिर से नया जीवन मिलता है, जो कि शुद्ध और स्वस्थ होकर दिन-रात के साथ पुनर्वहन करता है ॥११॥