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Rigveda / 10 / 15 / 10

ये स॒त्यासो॑ हवि॒रदो॑ हवि॒ष्पा इन्द्रे॑ण दे॒वैः स॒रथं॒ दधा॑नाः । आग्ने॑ याहि स॒हस्रं॑ देवव॒न्दैः परै॒: पूर्वै॑: पि॒तृभि॑र्घर्म॒सद्भि॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 15 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : शङ्खो यामायनः | देवता : पितरः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : ये । स॒त्यासः॑ । ह॒विः॒ऽअदः॑ । ह॒विः॒ऽपाः । इन्द्रे॑ण । दे॒वैः । स॒ऽरथ॑म् । दधा॑नाः । आ । अ॒ग्ने॒ । या॒हि॒ । स॒हस्र॑म् । दे॒व॒ऽव॒न्दैः । परैः॑ । पूर्वैः॑ । पि॒तृऽभिः॑ । घ॒र्म॒सत्ऽभिः॑ ॥ १०.१५.१०

पदार्थ : (ये सत्यासः हविरदः-हविष्पाः-इन्द्रेण देवैः-सरथं दधानाः) जो सर्वत्र व्याप्त जल का भक्षण तथा शोषण करनेवाली किरणें सूर्य तथा विद्युत् आदि दिव्य पदार्थों के साथ सहयोग रखती हुई (देववन्दैः पूर्वेः परैः-घर्मसद्भिः पितृभिः-अग्ने सहस्र आ याहि) देववन्दन दिव्यज्ञान की साधनभूत प्रातःकाल और सायंकाल रश्मियों के साथ तथा दिन में प्राप्त किरणों के साथ भी हे अग्ने ! तू असंख्यरूपेण बारम्बार प्राप्त हो ॥१०॥

भावार्थ : जो सूर्य की किरणें जल का भक्षण या शोषण करती हुई हों, उनके प्रकाश से किन्हीं दिव्य बातों का परिचय लेना चाहिये ॥१०॥