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Rigveda / 10 / 15 / 11

अग्नि॑ष्वात्ताः पितर॒ एह ग॑च्छत॒ सद॑:सदः सदत सुप्रणीतयः । अ॒त्ता ह॒वींषि॒ प्रय॑तानि ब॒र्हिष्यथा॑ र॒यिं सर्व॑वीरं दधातन ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 15 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : शङ्खो यामायनः | देवता : पितरः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अग्नि॑ऽस्वात्ताः । पि॒त॒रः॒ । आ । इ॒ह । ग॒च्छ॒त॒ । सदः॑ऽसदः । स॒द॒त॒ । सु॒ऽप्र॒नी॒त॒यः॒ । अ॒त्त । ह॒वींषि॑ । प्रऽय॑तानि । ब॒र्हिषि॑ । अथ॑ । र॒यिम् । सर्व॑ऽवीरम् । द॒धा॒त॒न॒ ॥ १०.१५.११

पदार्थ : (अग्निष्वात्ताः पितरः-इह आगच्छत सुप्रणीतयः सदःसदः सदत) यज्ञाग्नि को सम्यक् ग्रहण की हुई किरणें इस मण्डल में समन्तरूप से फैलें एवं सुसंचरित होकर घर-घर या स्थान-स्थान में भली प्रकार प्राप्त हों (बहिर्षि प्रयतानि हवींषि-आत्त-अध रयिं सर्ववीरं दधातन) यज्ञ में दी गई हव्यवस्तुओं को प्राप्त हों, पुनः सर्वप्रकार के वीरगुणयुक्त बल को हम में धारण करावें ॥११॥

भावार्थ : सूर्य की रश्मियाँ यज्ञ के संपर्क से सुगन्धगुणयुक्त होकर यज्ञमण्डल के घर-घर में प्रवेश करती हैं और लाभप्रद होती हैं ॥११॥