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Rigveda / 1 / 178 / 2

न घा॒ राजेन्द्र॒ आ द॑भन्नो॒ या नु स्वसा॑रा कृ॒णव॑न्त॒ योनौ॑। आप॑श्चिदस्मै सु॒तुका॑ अवेष॒न्गम॑न्न॒ इन्द्र॑: स॒ख्या वय॑श्च ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 178 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : न। घ॒। राजा॑। इन्द्रः॑। आ। द॒भ॒त्। नः॒। या। नु। स्वसा॑रा। कृ॒णव॑न्त। योनौ॑। आपः॑। चि॒त्। अ॒स्मै॒। सु॒ऽतुकाः॑। अ॒वे॒ष॒न्। गम॑त्। नः॒। इन्द्रः॑। स॒ख्या। वयः॑। च॒ ॥ १.१७८.२

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त (राजा) विद्या और विनय से प्रकाशमान राजा (नः) हम लोगों को (न) न (आ, दभत्) मारे न दण्ड देवे वैसे हम लोग (नु) भी उसको (घ) ही मत दुःख देवें, जैसे (या) जो (स्वसारा) दो बहिनियों के समान दो स्त्री (योनौ) घर में बन्धु को मारें वैसे उनके समान हम किसीको न मारें, जैसे विद्वान् जन हिंसा नहीं करते हैं वैसे सब लोग न (कृणवन्त) करें, जैसे (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (अस्मै) इस सज्जन के लिये (सख्या) मित्रपन के काम (वयः) जीवन (च) और (सुतुकाः) सुन्दर ग्रहण करनेवाली स्त्री (आपः) जलों को (अवेषन्) व्याप्त होती हैं (चित्) उनके समान (नः) हम लोगों को (गमत्) प्राप्त हो वैसे उनको हम भी प्राप्त होवें ॥ २ ॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे शास्त्रज्ञ धर्मात्मा दयालु विद्वान् किसीको नहीं मारते, वैसे सब आचरण करें ॥ २ ॥