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Rigveda / 1 / 178 / 3

जेता॒ नृभि॒रिन्द्र॑: पृ॒त्सु शूर॒: श्रोता॒ हवं॒ नाध॑मानस्य का॒रोः। प्रभ॑र्ता॒ रथं॑ दा॒शुष॑ उपा॒क उद्य॑न्ता॒ गिरो॒ यदि॑ च॒ त्मना॒ भूत् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 178 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अगस्त्यो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

पदपाठ : जेता॑। नृऽभिः॑। इन्द्रः॑। पृ॒त्ऽसु। शूरः॑। श्रोता॑। हव॑म्। नाध॑मानस्य। का॒रोः। प्रऽभ॑र्ता। रथ॑म्। दा॒शुषः॑। उ॒पा॒के। उत्ऽय॑न्ता। गिरः॑। यदि॑। च॒। त्मना॑। भूत् ॥ १.१७८.३

पदार्थ : (यदि) जो (नृभिः) नायक वीरों के साथ (शूरः) शत्रुओं की हिंसा करनेवाला (जेता) विजयशील (नाधमानस्य) माँगते हुए (कारोः) कार्यकारी पुरुष के (हवम्) ग्रहण करने योग्य विद्याबोध को (श्रोता) सुननेवाला (प्रभर्त्ता) उत्तम विद्याओं का धारण करनेवाला (दाशुषः) दानशील के (उपाके) समीप (गिरः) वाणियों का (उद्यन्ता) उद्यम करनेवाला (इन्द्रः) सेनाधीश तूँ (त्मना) अपने से (पृत्सु) संग्रामों में (रथम्) रथ को (च) भी ग्रहण करके प्रवृत्त (भूत्) होवे उसका दृढ़ विजय हो ॥ ३ ॥

भावार्थ : जो विद्या की याचना करें, उसको निरन्तर विद्या देवें। जो जितेन्द्रिय सत्यवादी होते हैं, उन्हीं को विद्या प्राप्त होती है। जो विद्या और शरीर बलों से शत्रुओं के साथ युद्ध करते हैं, उनका कैसे पराजय हो ? ॥ ३ ॥