Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 10 / 23 / 5

यो वा॒चा विवा॑चो मृ॒ध्रवा॑चः पु॒रू स॒हस्राशि॑वा ज॒घान॑ । तत्त॒दिद॑स्य॒ पौंस्यं॑ गृणीमसि पि॒तेव॒ यस्तवि॑षीं वावृ॒धे शव॑: ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 23 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : यः । वा॒चा । विऽवा॑चः । मृ॒ध्रऽवा॑चः । पु॒रु । स॒हस्रा॑ । असि॑वा । ज॒घान॑ । तत्ऽत॑त् । इत् । अ॒स्य॒ । पौंस्य॑म् । गृ॒णी॒म॒सि॒ । पि॒ताऽइ॑व । यः । तवि॑षीम् । व॒वृ॒धे । शवः॑ ॥ १०.२३.५

पदार्थ : (यः) जो शासक (वाचा) वज्र द्वारा (विवाचः मृध्रवाचः) विविध वाणीवाले तथा हिंसक वाणीवाले (अशिवाः) अकल्याणचिन्तक शत्रु हैं, उसके (पुरुसहस्रा) बहुत सहस्र जनों या गणों को (जघान) नष्ट करता है-मारता है (अस्य तत् तत्-इत् पौंस्यम्) इसके उस-उस विषयवाले सब पौरुष-बल की (गृणीमसि) हम प्रशंसा करते हैं (यः) जो (पिता-इव तविषीं शवः-ववृधे) पिता की भाँति हमारे बल एवं धन को बढ़ाता है ॥५॥

भावार्थ : राजा अपने शासन वज्र से विविध वाणीवाले और हिंसक वाणीवाले अहितचिन्तक जनों या शत्रुओं का हनन करे तथा पिता की भाँति प्रजा के बल और धन को बढ़ाता रहे, वह प्रजा द्वारा प्रशंसा के योग्य होता है ॥५॥