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Rigveda / 10 / 23 / 6

स्तोमं॑ त इन्द्र विम॒दा अ॑जीजन॒न्नपू॑र्व्यं पुरु॒तमं॑ सु॒दान॑वे । वि॒द्मा ह्य॑स्य॒ भोज॑नमि॒नस्य॒ यदा प॒शुं न गो॒पाः क॑रामहे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 23 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : विमद ऐन्द्रः प्राजापत्यो वा वसुकृद्वा वासुक्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : स्तोम॑म् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वि॒ऽम॒दाः । अ॒जी॒ज॒न॒न् । अपू॑र्व्यम् । पु॒रु॒ऽतम॑म् । सु॒ऽदान॑वे । वि॒द्म । हि । अ॒स्य॒ । भोज॑नम् । इ॒नस्य॑ । यत् । आ । प॒शुम् । न । गो॒पाः । क॒रा॒म॒हे॒ ॥ १०.२३.६

पदार्थ : (इन्द्र) हे राजन् ! (ते सुदानवे) तुझ शोभन सुखदाता के लिये (विमदाः) तेरे राष्ट्र में विशिष्ट हर्ष को प्राप्त हुए प्रजाजन (पुरुतमम्-अपूर्व्यं स्तोमम्) बहुत प्रकार के श्रेष्ठ शुल्करूप अन्न को (अजीजनन्) हम सम्पन्न करते हैं (अस्य-इनस्य भोजनं विद्म हि) इस तुझ स्वामिरूप शासक के पालन को हम मानते हैं (यत् पशुं न गोपाः) क्योंकि दूध देनेवाले पशु के प्रति दूध के प्रतिकाररूप में उसका आहारदान से जैसे गोपालक सत्कार करते हैं, उसी भाँति पालनादि निमित्त तेरा उपहार द्वारा हम सत्कार करते हैं ॥६॥

भावार्थ : प्रजा को उत्तम सुख देनेवाले राजा के राष्ट्र में विशेषरूप से हर्षित सुखी प्रजा बहुत प्रकार से उत्तम अन्न आदि तथा उपहार दिया करें। ऐसे सुख देनेवाले शासक का प्रजाएँ सत्कार किया करती हैं। जैसे दूध देनेवाले पशु का प्रतिदान-आहारदान से सत्कार करते हैं ॥६॥