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Rigveda / 10 / 27 / 9

सं यद्वयं॑ यव॒सादो॒ जना॑नाम॒हं य॒वाद॑ उ॒र्वज्रे॑ अ॒न्तः । अत्रा॑ यु॒क्तो॑ऽवसा॒तार॑मिच्छा॒दथो॒ अयु॑क्तं युनजद्वव॒न्वान् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : सम् । यत् । वय॑म् । य॒व॒स॒ऽअदः॑ । जना॑नाम् । अ॒हम् । य॒व॒ऽअदः॑ । उ॒रु॒ऽअज्रे॑ । अ॒न्तरिति॑ । अत्र॑ । यु॒क्तः॑ । अ॒व॒ऽसा॒तार॑म् । इ॒च्छा॒त् । अथो॒ इति॑ । अयु॑क्तम् । यु॒न॒ज॒त् । व॒व॒न्वान् ॥ १०.२७.९

पदार्थ : (जनानाम्) उत्पन्न हुओं के मध्य में (यत्-वयं यवादः) जिससे कि हम अन्न खानेवाले मनुष्य (यवसादः) घास खानेवाले गौ आदि पशु हैं-उन सबके (उर्वज्रे-अन्तः) महान् प्राप्तिस्थान हृदय में (अहम्-सम्) मैं परमात्मा सम्यक् विराजमान हूँ। (अत्र युक्तः) इस हृदय में युक्त हुआ हूँ (अवसातारम्-इच्छात्) मुझ सहयोगी परमात्मा की उपासक इच्छा करे (अथो) और (ववन्वान्) सङ्ग को चाहता हुआ-चाहने के हेतु (अयुक्तं युनजत्) योग में न लगे अर्थात् अस्थिर मन को युक्त करे ॥९॥

भावार्थ : उत्पन्न हुए प्राणियों, अन्न खानेवाले मनुष्यों और घास खानेवाले पशुओं के हृदय में परमात्मा विराजमान है। उस सहयोगी परमात्मा को समागमार्थ चाहे और मनको उसके अन्दर जोड़े-लगावे ॥९॥