Rigveda / 10 / 27 / 10
अत्रेदु॑ मे मंससे स॒त्यमु॒क्तं द्वि॒पाच्च॒ यच्चतु॑ष्पात्संसृ॒जानि॑ । स्त्री॒भिर्यो अत्र॒ वृष॑णं पृत॒न्यादयु॑द्धो अस्य॒ वि भ॑जानि॒ वेद॑: ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 27 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vasukra aindraH | Devta : indra: | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : atredu me ma.msase satyamukta.m dvipaachcha yachchatuShpaatsa.msRRijaani . striibhiryo atra vRRiShaNa.m pRRitanyaadayuddho asya vi bhajaani vedaH .
Component Words : atra . it . uu.N iti . me . ma.msase . satyam . uktam . dvi.apaat . cha . yat . chatuH.apaat . sam.asRRijaani . strii.abhiH . yaH . atra . vRRiShaNam . pRRitanyaat . ayuddhaH . asya . vi . bhajaani . vedaH . 10.27.10
In Hindi:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय :
पदपाठ : अत्र॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । मे॒ । मं॒स॒से॒ । स॒त्यम् । उ॒क्तम् । द्वि॒ऽपात् । च॒ । यत् । चतुः॑ऽपात् । स॒म्ऽसृ॒जानि॑ । स्त्री॒ऽभिः । यः । अत्र॑ । वृष॑णम् । पृ॒त॒न्यात् । अयु॑द्धः । अ॒स्य॒ । वि । भ॒जा॒नि॒ । वेदः॑ ॥ १०.२७.१०
पदार्थ : (अत्र-इत्-उ) इस जन्म में ही निश्चय (मे-उक्तं सत्यं मंससे) मेरे उक्त सत्य को तू जानता है (यत् द्विपात्-च चतुष्पात्) दो पैरवाला और चार पैरवाला जो प्राणी है (संसृजानि) उस सबको मैं परमात्मा उत्पन्न करता हूँ। (अत्र यो वृषणं पृतन्यात्) इस संसार में मुझ बलवान् के प्रति जो शत्रुता करता है, वह (स्त्रीभिः) स्त्रियों-बलहीन पुरुषों के समान है (अयुद्धः-अस्य वेदः-वि भजानि) मैं युद्ध न करते हुए भी इसके धन बलको उससे अलग कर देता हूँ ॥१०॥
भावार्थ : मनुष्य को यह बात निश्चय जाननी चाहिये कि दो पैरवाले और चार पैरवाले सभी प्राणी मात्र को परमात्मा उत्पन्न करता है। जो उस के प्रति विरोध करता है, वह उसे धन और बल से विहीन कर देता है ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुक्र ऐन्द्रः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
पदपाठ : अत्र॑ । इत् । ऊँ॒ इति॑ । मे॒ । मं॒स॒से॒ । स॒त्यम् । उ॒क्तम् । द्वि॒ऽपात् । च॒ । यत् । चतुः॑ऽपात् । स॒म्ऽसृ॒जानि॑ । स्त्री॒ऽभिः । यः । अत्र॑ । वृष॑णम् । पृ॒त॒न्यात् । अयु॑द्धः । अ॒स्य॒ । वि । भ॒जा॒नि॒ । वेदः॑ ॥ १०.२७.१०
भावार्थ :