Rigveda / 10 / 48 / 8
अ॒हं गु॒ङ्गुभ्यो॑ अतिथि॒ग्वमिष्क॑र॒मिषं॒ न वृ॑त्र॒तुरं॑ वि॒क्षु धा॑रयम् । यत्प॑र्णय॒घ्न उ॒त वा॑ करञ्ज॒हे प्राहं म॒हे वृ॑त्र॒हत्ये॒ अशु॑श्रवि ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 48 | Mantra No : 8
In English:
Seer : indro vaikuNThaH | Devta : indro vaikuNThaH | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : aha.m gu~Ngubhyo atithigvamiShkaramiSha.m na vRRitratura.m vikShu dhaarayam . yatparNayaghna uta vaa kara~njahe praaha.m mahe vRRitrahatye ashushravi .
Component Words : aham . gu~Ngu.abhyaH . atithi.agvam . iShkaram . iSham . na . vRRitra.aturam . vikShu . dhaarayam . yat . parNaya.aghne . uta . vaa . kara~nja.ahe . pra . aham . mahe . vRRitra.ahatye . ashushravi . 10.48.8
In Hindi:
ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : अ॒हम् । गु॒ङ्गुऽभ्यः॑ । अ॒ति॒थि॒ऽग्वम् । इष्क॑रम् । इष॑म् । न । वृ॒त्र॒ऽतुर॑म् । वि॒क्षु । धा॒र॒य॒म् । यत् । प॒र्ण॒य॒ऽघ्ने । उ॒त । वा॒ । क॒र॒ञ्ज॒ऽहे । प्र । अ॒हम् । म॒हे । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । अशु॑श्रवि ॥ १०.४८.८
पदार्थ : (अहम्) मैं परमात्मा (विक्षु गुङ्गुभ्यः) मनुष्यप्रजाओं में मेरे लिए जो अव्यक्त शब्द गाते हैं-मानसिक जप करते हैं, उनके हित के लिए (अतिथिग्वम्) अतिथि द्वारा-ज्ञानोपासक द्वारा प्रापणीय (इष्करम्-इषं न धारयम्) इष्ट करनेवाले अन्नादि की भाँति मोक्षसुख (वृत्रतुरम्) पापज्ञाननाशक को धारण करता हूँ (यत् पर्णयघ्ने-उत वा करञ्जहे) यतः मुझ पालनेवाले परमात्मा को प्राप्त होनेवाले आस्तिक उपासक जन को जो हनन करता है, उसके लिए तथा मेरी शरण को जो त्यागता है, उस नास्तिक के लिए (महे वृत्रहत्ये-अहं प्र-अशुश्रवि) उसके वध के निमित्त-महान् पापनाशन कार्य के निमित्त, मैं प्रकृष्टरूप से प्रसिद्ध हूँ ॥८॥
भावार्थ : जो मनुष्य परमात्मा के लिए उपांशु-अव्यक्त या मानसिक जप करता है, वह उनके अज्ञान को नष्ट करता है तथा जो ज्ञानी जन परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं, वह उन्हें मोक्ष प्रदान करता है। परमात्मा की शरण लेनेवाले के प्रति जो पापचिन्तन करता है, उसको वह दण्ड देता है ॥८॥
In Sanskrit:
ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : अ॒हम् । गु॒ङ्गुऽभ्यः॑ । अ॒ति॒थि॒ऽग्वम् । इष्क॑रम् । इष॑म् । न । वृ॒त्र॒ऽतुर॑म् । वि॒क्षु । धा॒र॒य॒म् । यत् । प॒र्ण॒य॒ऽघ्ने । उ॒त । वा॒ । क॒र॒ञ्ज॒ऽहे । प्र । अ॒हम् । म॒हे । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । अशु॑श्रवि ॥ १०.४८.८
भावार्थ :