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Rigveda / 10 / 48 / 9

प्र मे॒ नमी॑ सा॒प्य इ॒षे भु॒जे भू॒द्गवा॒मेषे॑ स॒ख्या कृ॑णुत द्वि॒ता । दि॒द्युं यद॑स्य समि॒थेषु॑ मं॒हय॒मादिदे॑नं॒ शंस्य॑मु॒क्थ्यं॑ करम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 48 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : स्वराडार्चीजगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : प्र । मे॒ । नमी॑ । सा॒प्यः । इ॒षे । भु॒जे । भू॒त् । गवा॑म् । एषे॑ । स॒ख्या । कृ॒णु॒त॒ । द्वि॒ता । दि॒द्युम् । यत् । अ॒स्य॒ । स॒मि॒थेषु॑ । मं॒हय॑म् । आत् । इत् । ए॒न॒म् । शंस्य॑म् । उ॒क्थ्य॑म् । क॒र॒म् ॥ १०.४८.९

पदार्थ : (मे नमी साप्यः-इषे भुजे प्रभूत्) मेरा स्तुति करनेवाला जीवन्मुक्त, मेरा ज्ञान होने पर मोक्षसुखभोग में समर्थ होता है (गवाम्-एषे द्विता सख्या कृणुत) स्तुतियों के समर्पण करने पर दो प्रकार की मित्रताएँ अर्थात् संसार में प्रवृत्त मोक्ष में होनेवाली को मेरे साथ सम्पादित करो (अस्य) इस जीवन्मुक्त स्तुति करनेवाले के (समिथेषु) काम क्रोध आदि के संघर्षस्थलों में (यत्-दिद्युं मंहयम्) जब भी ज्ञानप्रकाश मैं देता हूँ (आत्-इत्-एनं शंस्यम्-उक्थ्यं करम्) अनन्तर ही इस प्रशंसनीय-सर्वत्र मनुष्यों द्वारा स्तुत्य करता हूँ ॥९॥

भावार्थ : परमात्मा की स्तुति करनेवाला मोक्षसुख प्राप्त करने में समर्थ या अधिकारी बन जाता है तथा निरन्तर स्तुतियों के द्वारा परमात्मा की मित्रता को प्राप्त करता है, जिससे मोक्षसुख के साथ सांसारिक सच्चा सुख भी प्राप्त करता है और काम क्रोध आदि भीतरी शत्रु भी उसके नष्ट हो जाते हैं। परमात्मा द्वारा ज्ञानप्रकाश प्राप्त कर मनुष्यों में प्रसिद्धि प्राप्त करता है ॥९॥