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Rigveda / 10 / 48 / 11

आ॒दि॒त्यानां॒ वसू॑नां रु॒द्रिया॑णां दे॒वो दे॒वानां॒ न मि॑नामि॒ धाम॑ । ते मा॑ भ॒द्राय॒ शव॑से ततक्षु॒रप॑राजित॒मस्तृ॑त॒मषा॑ळ्हम् ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 48 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : आ॒दि॒त्याना॑म् । वसू॑नाम् । रु॒द्रिया॑णाम् । दे॒वः । दे॒वाना॑म् । न । मि॒ना॒मि॒ । धाम॑ । ते । मा॒ । भ॒द्राय॑ । शव॑से । त॒त॒क्षुः॒ । अप॑राऽजितम् । अस्तृ॑तम् । अषा॑ळ्हम् ॥ १०.४८.११

पदार्थ : (आदित्यानां वसूनां रुद्रियाणां देवानां धाम) सूर्य के समान तेजस्वी अड़तालीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य सेवन करनेवालों के, भूमिसमान बसाने के स्वभाववाले चौबीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्यव्रतवालों के, अग्नि के समान गतिकर्मवाले चवालीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्यसेवन करनेवालों के, उनके अध्यापक विद्वानों के पद या स्थान को (देवः-न मिनामि) मैं उन-उनके गुणों का दाता हिंसित नहीं करता हूँ (ते) वे आदित्य आदि ब्रह्मचारी (भद्राय शवसे) कल्याण के लिए और अपने आत्मबल के लिए (अपराजितम्-अस्तृतम्-अषाढं मा ततक्षुः) पराजयरहित हिंसावर्जित न सहने योग्य मुझ परमात्मा को अपने अन्दर साक्षात् करें ॥११॥

भावार्थ : अड़तालीस वर्ष के ब्रह्मचारियों, चवालीस वर्ष के ब्रह्मचारियों और चौबीस वर्ष के ब्रह्मचारियों के पद को वह परमात्मा क्षीण नहीं करता, अपितु वे अपने कल्याण और स्वात्मबल के लिए उसे अपने अन्दर साक्षात् करते हैं। वह उन्हें कल्याण और आत्मबल देनेवाला है ॥११॥