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Rigveda / 10 / 48 / 10

प्र नेम॑स्मिन्ददृशे॒ सोमो॑ अ॒न्तर्गो॒पा नेम॑मा॒विर॒स्था कृ॑णोति । स ति॒ग्मशृ॑ङ्गं वृष॒भं युयु॑त्सन्द्रु॒हस्त॑स्थौ बहु॒ले ब॒द्धो अ॒न्तः ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 48 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : प्र । नेम॑स्मिन् । द॒दृ॒शे॒ । सोमः॑ । अ॒न्तः । गो॒पाः । नेम॑म् । आ॒विः । अ॒स्था । कृ॒णो॒ति॒ । सः । ति॒ग्मऽशृ॑ङ्गम् । वृ॒ष॒भम् । युयु॑त्सन् । द्रु॒हः । त॒स्थौ॒ । ब॒हु॒ले । ब॒द्धः । अ॒न्तरिति॑ ॥ १०.४८.१०

पदार्थ : (नेमस्मिन्) आधे अर्थात् स्तोतृग-आस्तिकगण के अन्दर शान्तस्वरूप परमात्मा रक्षकरूप में साक्षात् होता है (नेमम्-अस्था-आविः-कृणोति) आधे गण को अर्थात् नास्तिकगण को अपने क्षेपणबल से ताडन से अपने को प्रकट करता है कि कर्मफलदाता कोई है (स तिग्मशृङ्गं वृषभं युयुत्सन्) वह तीक्ष्णशृङ्गवाले वृषभ जैसे के साथ युद्ध करता हुआ सा (द्रुहः-तस्थौ) द्रोह करते विरोधियों नास्तिकों के सम्मुख आता है (बहुले-अन्तः-बद्धः) बहुत सारे नास्तिकगण के अन्दर अवरुद्ध होकर बैठकर अपने को प्रकट करता है ॥१०॥

भावार्थ : परमात्मा मनुष्यों के एक वर्ग अर्थात् आस्तिक जनों में स्तुति करनेवालों के अन्दर कल्याणकारीरूप में साक्षात् होता है, दूसरे वर्ग नास्तिक वर्ग के सामने दण्ड देने को दण्डदातारूप में सामने आता है ॥१०॥