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Rigveda / 10 / 50 / 3

के ते नर॑ इन्द्र॒ ये त॑ इ॒षे ये ते॑ सु॒म्नं स॑ध॒न्य१॒॑मिय॑क्षान् । के ते॒ वाजा॑यासु॒र्या॑य हिन्विरे॒ के अ॒प्सु स्वासू॒र्वरा॑सु॒ पौंस्ये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 50 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : के । ते । नरः॑ । इ॒न्द्र॒ । ये । ते॒ । इषे॒ । ये । ते॒ । सु॒म्नम् । स॒ऽध॒न्य॑म् । इय॑क्षान् । के । ते॒ । वाजा॑य । अ॒सु॒र्या॑य । हि॒न्वि॒रे॒ । के । अ॒प्ऽसु । स्वासु॑ । उ॒र्वरा॑सु । पौंस्ये॑ ॥ १०.५०.३

पदार्थ : (इन्द्र के ते नरः) हे परमात्मन् ! वे तेरे मुमुक्षुजन कौन हैं (ये ते इषे) जो तेरे एषणीय मोक्ष के लिए (सुम्नं सधन्यम्-इयक्षान्) जो अपने को साधु और सधन्य, सफल सङ्गत करते हैं (के ते वाजाय-असुर्याय हिन्विरे) कौन तेरे अमृत अन्नभोग के लिए अपने को प्रेरित करते हैं (के स्वासु-उर्वरासु-अप्सु पौंस्ये) कौन अपनी ऊँची कामनाओं में और आत्मभाव में आत्मा को प्रेरित करते हैं ॥३॥

भावार्थ : मोक्ष की इच्छा करनेवाले और अपने को उसके अधिकारी बनानेवाले विरले होते हैं, एवं परमात्मा के अमृतभोग को चाहनेवाले अपने को उन्नत किया करते हैं ॥३॥