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Rigveda / 10 / 50 / 4

भुव॒स्त्वमि॑न्द्र॒ ब्रह्म॑णा म॒हान्भुवो॒ विश्वे॑षु॒ सव॑नेषु य॒ज्ञिय॑: । भुवो॒ नॄँश्च्यौ॒त्नो विश्व॑स्मि॒न्भरे॒ ज्येष्ठ॑श्च॒ मन्त्रो॑ विश्वचर्षणे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 50 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : इन्द्रो वैकुण्ठः | देवता : इन्द्रो वैकुण्ठः | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय :

पदपाठ : भुवः॑ । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । ब्रह्म॑णा । म॒हान् । भुवः॑ । विश्वे॑षु । सव॑नेषु । य॒ज्ञियः॑ । भुवः॑ । नॄन् । च्यौ॒त्नः । विश्व॑स्मिन् । भरे॑ । ज्येष्ठः॑ । च॒ । मन्त्रः॑ । वि॒श्व॒ऽच॒र्ष॒णे॒ ॥ १०.५०.४

पदार्थ : (इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन् ! (त्वम्) तू (ब्रह्मणा महान् भुवः) वेदज्ञान से महान् है (विश्वेषु सवनेषु यज्ञियः-भुवः) सब सम्पादनीय ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, संन्यास आश्रमों में सङ्गमनीय है (नॄन्-च्यौत्नः-भुवः) मुमुक्षों के प्रति रागादियों को हटानेवाला बलवान् है (विश्वचर्षणे) हे सर्वद्रष्टा परमात्मन् ! (विश्वस्मिन् भरे ज्येष्ठः-मन्त्रः-च) सम्पूर्ण भरणीय-धारणीय-निर्वाह करने योग्य वस्तुओं में तू ज्येष्ठ मन्त्रप्रद और ज्ञानप्रद है ॥४॥

भावार्थ : परमात्मा महान् ज्ञानवान् है। सब आश्रमियों के समागम योग्य है। मुमुक्षुओं के अन्दर से रागादि दोषों को हटानेवाला है ।समस्त भरण करनेवाले पदार्थों में ज्येष्ठ और ज्ञानप्रद है ॥४॥