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Rigveda / 10 / 63 / 10

सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्याम॑ने॒हसं॑ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिं सु॒प्रणी॑तिम् । दैवीं॒ नावं॑ स्वरि॒त्रामना॑गस॒मस्र॑वन्ती॒मा रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 63 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : पादनिचृज्ज्गती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : सु॒ऽत्रामा॑णम् । पृ॒थि॒वीम् । द्याम् । अ॒ने॒हस॑म् । सु॒ऽशर्मा॑णम् । अदि॑तिम् । सु॒ऽप्रनी॑तिम् । दैवी॑म् । नाव॑म् । सु॒ऽअ॒रि॒त्राम् । अना॑गसम् । अस्र॑वन्तीम् । आ । रु॒हे॒म॒ । स्व॒स्तये॑ ॥ १०.६३.१०

पदार्थ : (सुत्रामाणम्) सुखपूर्वक संसारसागर से रक्षा करनेवाली (पृथिवीम्) प्रथित (द्याम्) ज्ञान से दीप्त (अनेहसम्) पापरहित- (सुशर्माणम्) उत्तम सुखरूप (अदितिम्) अखण्डित (सुप्रणीतिम्) आत्मा का सुप्रणयन करनेवाली (स्वरित्राम्) शोभन अरित्रोंवाली जैसी सुरक्षित (अस्रवन्तीम्) छिद्ररहित दृढ़ (दैवीं नावम्) दैवी नौका को-उत्तम स्तुतियोग्य मुक्तिरूप नौका को (स्वस्तये-आरुहेम) कल्याण के लिए प्राप्त करें ॥१०॥

भावार्थ : मुक्ति संसारसागर से त्राण करनेवाली, उत्तम सुख देनेवाली, आत्मा को अपने स्वरूप में लानेवाली आदि सद्गुणों से युक्त दिव्य नौका के समान है। उसे हमें प्राप्त करना चाहिए ॥१०॥