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Rigveda / 10 / 63 / 11

विश्वे॑ यजत्रा॒ अधि॑ वोचतो॒तये॒ त्राय॑ध्वं नो दु॒रेवा॑या अभि॒ह्रुत॑: । स॒त्यया॑ वो दे॒वहू॑त्या हुवेम शृण्व॒तो दे॑वा॒ अव॑से स्व॒स्तये॑ ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 63 | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : गयः प्लातः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : विश्वे॑ । य॒ज॒त्राः॒ । अधि॑ । वो॒च॒त॒ । ऊ॒तये॑ । त्राय॑ध्वम् । नः॒ । दुः॒ऽएवा॑याः । अ॒भि॒ऽह्रुतः॑ । स॒त्यया॑ । वः॒ । दे॒वऽहू॑त्या । हु॒वे॒म॒ । शृ॒ण्व॒तः । दे॒वाः॒ । अव॑से । स्व॒स्तये॑ ॥ १०.६३.११

पदार्थ : (विश्वे यजत्राः) हे सब विद्याओं में प्रविष्ट सङ्गमनीय विद्वानो ! (ऊतये) रक्षा के लिए (अधि वोचत) शिष्यरूप से अधिकार में लेकर हमें उपदेश करो (दुरेवायाः (अभिह्रुतः-नः-त्रायध्वम्) दुःख को प्राप्त करानेवाली कुटिल मनोभावना से हमें-हमारी रक्षा करो (देवाः) हे विद्वानों ! (शृण्वतः-वः) तुम प्रार्थना सुननेवालों को (देवहूत्या सत्यया) देवों को प्रार्थित करते हैं जिससे, उस शुद्ध स्तुति के द्वारा (अवसे स्वस्तये हुवेम) रक्षा के लिए कल्याण के लिए प्रार्थित करते हैं ॥११॥

भावार्थ : विद्याओं में निष्णात विद्वानों के पास शिष्यभाव से उपस्थित होकर विद्या ग्रहण करनी चाहिए। अपनी दुर्वासनाओं या दुष्प्रवृत्तियों को उनकी सङ्गति द्वारा दूर करना चाहिए। उनकी प्रशंसा अपने कल्याण के लिए-सद्भाव से करनी चाहिए ॥११॥