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Rigveda / 10 / 65 / 9

प॒र्जन्या॒वाता॑ वृष॒भा पु॑री॒षिणे॑न्द्रवा॒यू वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा । दे॒वाँ आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं हवामहे॒ ये पार्थि॑वासो दि॒व्यासो॑ अ॒प्सु ये ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 65 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : प॒र्जन्या॒वाता॑ । वृ॒ष॒भा । पु॒री॒षिणा॑ । इ॒न्द्र॒वा॒यू इति॑ । वरु॑णः । मि॒त्रः । अ॒र्य॒मा । दे॒वान् । आ॒दि॒त्यान् । अदि॑तिम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । ये । पार्थि॑वासः । दि॒व्यासः॑ । अ॒प्ऽसु । ये ॥ १०.६५.९

पदार्थ : (पर्जन्यवाता) मेघ और वायु (ऋषभा) सुखवर्षक (पुरीषिणा) जलवाले-जलप्रद (इन्द्रवायू) विद्युत् और वायु (वरुणः-मित्रः-अर्यमा) सूर्य का प्रक्षेपणधर्म आकर्षणधर्म और सूर्य (ये) जो भी (पार्थिवासः) पृथिवीस्थ (ये-अप्सु) जो अन्तरिक्षस्थ अन्तरिक्ष में (दिव्यासः) द्युलोकस्थ-द्युलोक के सब देव अर्थात् दिव्यगुण पदार्थ हैं, उन (देवान्) देवों को (आदित्यान्-अदितिम्) रश्मियों को और उषा को (हवामहे) ज्ञान की सिद्धि के लिए सुनें-ग्रहण करें ॥९॥

भावार्थ : सुखवर्षक मेघ और वायु तथा जलमय विद्युत् और वायु, सूर्य का प्रक्षेपणधर्म और आकर्षणधर्म तथा सूर्य एवं पृथिवी के वनस्पति आदि पदार्थ, अन्तरिक्ष के स्तर दिशाएँ और द्युलोक के ग्रह तारे आदि हमारे उपयोगी एवं ज्ञानवृद्धि के लिए सिद्ध हों ॥९॥