Rigveda / 10 / 65 / 10
त्वष्टा॑रं वा॒युमृ॑भवो॒ य ओह॑ते॒ दैव्या॒ होता॑रा उ॒षसं॑ स्व॒स्तये॑ । बृह॒स्पतिं॑ वृत्रखा॒दं सु॑मे॒धस॑मिन्द्रि॒यं सोमं॑ धन॒सा उ॑ ईमहे ॥
Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 65 | Mantra No : 10
In English:
Seer : vasukarNo vaasukraH | Devta : vishvedevaa: | Metre : nichRRijjagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready
Verse : tvaShTaara.m vaayumRRibhavo ya ohate daivyaa hotaaraa uShasa.m svastaye . bRRihaspati.m vRRitrakhaada.m sumedhasamindriya.m soma.m dhanasaa u iimahe .
Component Words : tvaShTaaram . vaayum . RRIbhavaH . yaH . ohate . daivyaa . hotaarau . uShasam . svastaye . bRRihaspatim . vRRitra.akhaadam . su.amedhasam . indriyam . somam . dhana.asaaH . uu.N iti . iimahe . 10.65.10
In Hindi:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
विषय :
पदपाठ : त्वष्टा॑रम् । वा॒युम् । ऋ॒भ॒वः॒ । यः । ओह॑ते । दैव्या॑ । होता॑रौ । उ॒षस॑म् । स्व॒स्तये॑ । बृह॒स्पति॑म् । वृ॒त्र॒ऽखा॒दम् । सु॒ऽमे॒धस॑म् । इ॒न्द्रि॒यम् । सोम॑म् । ध॒न॒ऽसाः । ऊँ॒ इति॑ । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.६५.१०
पदार्थ : (ऋभवः) हे मेधावी विद्वानों ! (यः) जो (त्वष्टारम्) सूर्य को (वायुम्) वायु को (दैव्या होतारौ) इन दोनों अमानुष होताओं को (उषसम्) उषा को (स्वस्तये-ओहते) कल्याण के लिए आह्वान करता है-सेवन करता है (वृत्रखादं सुमेधसं बृहस्पतिम्) पापनाशक उत्तम सङ्गतिवाले परमात्मा को (इन्द्रियं सोमं धनसाः-उ-ईमहे) आत्मा के कल्याण निमित्त शान्त परमात्मा की अध्यात्मधन का सेवन करनेवाले हम अवश्य याचना करते हैं ॥१०॥
भावार्थ : मेधावी जन प्रतिदिन उषा वेला में अग्नि और वायु के द्वारा होम सम्पादन करें, स्वास्थ्य रक्षा के लिए। अध्यात्मयज्ञ अर्थात् संध्या के द्वारा परमात्मा की उपासना करके अध्यात्मधन-आत्मशान्ति का लाभ लें ॥१०॥
In Sanskrit:
ऋषि : वसुकर्णो वासुक्रः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः
पदपाठ : त्वष्टा॑रम् । वा॒युम् । ऋ॒भ॒वः॒ । यः । ओह॑ते । दैव्या॑ । होता॑रौ । उ॒षस॑म् । स्व॒स्तये॑ । बृह॒स्पति॑म् । वृ॒त्र॒ऽखा॒दम् । सु॒ऽमे॒धस॑म् । इ॒न्द्रि॒यम् । सोम॑म् । ध॒न॒ऽसाः । ऊँ॒ इति॑ । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.६५.१०
भावार्थ :